दहीवड़ा

दहीवड़ा बनाते वक़्त अगर हम वड़े को कड़ाही में से तल कर निकालने के बाद थोड़ी देर पानी में रख कर न निचोड़ें तो वह कड़ा और कठोर ही रह जाता है, उसमें कोमलता नहीं आती है| उसके भीतर रस का प्रवेश नहीं होता है| वह टूट जाता है| खाने में कोई स्वाद नहीं आता|

पानी में से निचोड़कर दही में डालने के बाद जब वह दही को अपने भीतर खींच लेता है तब उसका कड़ापन दूर होता है, उसकी कठोरता समाप्त हो जाती है|

ऐसे दहीवड़े को खाने में..

परम आनंद!!

हम भी तो किसी किसी मुद्दे पर कड़े वड़े के समान होते हैं| रसहीन हो जाते हैं  हम और परिणाम..कड़ेपन, कठोरपन की वजह से टूट जाते हैं| स्वीकारे नहीं जाते|

आज दहीवड़े ने हमें यह सिखाया…

हमें अगर कोमल और रस से भरपूर बनना है, गुणवान बनना है तो कभी कभी  दूसरे से भी उसे प्राप्त करना होगा| सबकुछ हम ही कर सकते हैं ऐसा भाव छोड़कर अपने अंतःकरण को दूसरे के सद्गुण रूपी पानी में डूबोकर थोड़ा निचोड़ना होगा|

अपनी अपनी कुंडली में चंद्र, बुध, शनि और चतुर्थ भाव का सूक्ष्म विश्लेषण करना होगा|

तब हम होंगे रसमय, कोमल|

एक बार जब हम रसमय और कोमल होने की कला सिख गए तो फिर क्या बात है ..

परम आनंद!!