विश्व पर्यावरण दिवस

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फोटो, साभार: Google

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:

पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:

सर्वं शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥

सर्वत्र जो शांति विराजमान है, वो शांति जो बाहर तो सब जगह है किंतु मुझमें नहीं है, मेरे भीतर नहीं है। वही शांति मुझे भी प्राप्त हो।

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

समस्त लोकों और समस्त प्राकृतिक शक्तियों में शांति हो और वही शांति स्वयं के अंतस में भी हो.. यजुर्वेद का यह मंत्र मनुष्य और पर्यावरण के बीच संबंध की प्रगाढ़ता को दर्शाता है। मनुष्य और पर्यावरण अलग अलग नहीं हैं।

वेद के अनुसार वो एक ही है जो सब में समाया हुआ है और वही इन सबमें अलग अलग रूपों में व्यक्त है। पर्यावरण और मनुष्य के बीच कोई विभेदक रेखा नहीं है।

पर्यावरण संरक्षण के इस सूत्र को छोड़कर जब तक हम पाश्चात्य संस्कृति के मोहपाश में बंधे रहेंगे .. यही मानते रहेंगे कि ” Man is the maker of all things” .. मनुष्य का प्रकृति पर नियंत्रण है।

पाश्चात्य चिंतन के प्रभाव में आकर, प्रकृति और मनुष्य को जबतक भिन्न मानते रहेंगे विनाश की तरफ जाएंगे …

भारतीय वैदिक चिंतन.. ये सब ही मुझमें और मैं ही इन सबमें ..इसको मानेंगे तो सृजन होगा ..विकास की तरफ जाएंगे ..

जबतक ये एकात्म स्थापित नहीं करेंगे तबतक Ecology, Deep Ecology, Environment, Environmental law ये सिर्फ कहने की बातें रहेंगी। कितनी भी चर्चा परिचर्चा संवाद किए जाएं इनसे ये संकट सुलझने वाला नहीं है।