विश्वगुरु भारत

फोटो, साभार: google

वर्तमान में ग्रहों का संचरण कुछ इस प्रकार हो रहा है मानो ग्रहों ने विश्व को बदलने का दृढ संकल्प लिया हो| देवगुरु बृहस्पति का कड़े अनुशासन के पालनकर्ता के साथ लयात्मक सम्बन्ध के समय, मंगल, शनि और गुरु का, शुक्र और केतु के साथ एक गठजोड़ में जाना|

दो ऐसे खेमों का निर्माण जहाँ एक सृजन करना चाहता है तो दूसरा इस मार्ग को छल, कपट और धोखे द्वारा दुरूह बनाना चाह रहा है|

पहले खेमे में जहाँ सृजन की बात हो रही है, नव निर्माण की बात हो रही है, वहां, मंगल के होते हुए भी सब मंगल नहीं है|

इसके अलावा शुक्र ऊपर ऊपर तो अच्छाई का आवरण चढ़ाये हुए है लेकिन भीतर भीतर वह बड़ी ही चतुराई से इन सभी को अजगर की तरह लीलने की तैयारी किये बैठा है| न सिर्फ लीलने कि अपितु इन्हे लीलकर इस प्रकार लोगों के बीच जाकर स्वयं को प्रचारित करने और स्थापित करने कि मानों इसने कुछ नहीं किया है| शुक्र को जानना कोई खेल बात नहीं है| जब भी हमको लगता है कि हम इसको जानने लगें हैं यह उसी क्षण अपना स्वभाव ऐसा बदलता है ओर इस सहजता से आगे बढ़ जाता है मानों कुछ हुआ ही न हो|

30 जून 2020 को ग्रहों द्वारा कुछ ऐसे योग निर्मित हुए हैं जिनके बारे में ज्योतिषशास्त्र अन्य फलों के अलावा एक फल जो कहता है वह यह कि इस योग के निर्माण से वर्णसंकरों का नाश होता है|

‘ वर्णसंकर’ – क्या है ??  

वर्णसंकर – ‘वर्ण’ और ‘संकर’ से मिलकर बना है |

‘ वर्ण’ को जानें |

रामचरितमानस में वर्ण धर्म की चर्चा स्वधर्म के रूप में की गयी है |

‘ वर्णाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग| चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहि भय सोक न रोग ||’

गुरु वशिष्ठ द्वारा वर्णाश्रम धर्म का वर्णन इस प्रकार किया गया है –

‘सोचिअ विप्र जो बेद बिहीना | तजि निज धरमु विषय लयलीना ||’

ब्राह्मण के धर्म का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वेद ज्ञान से शून्य और विषय सेवन में लगा ब्राह्मण शोक करने योग्य है |

‘सोचिअ नृपति जो नीति न जाना | जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना ||’

नृपति कहके एक तरह से क्षत्रिय धर्म की चर्चा की गयी  है और कहा गया है कि नीति से शून्य हो और प्रजा जिसे प्राण के समान प्रिय नहीं हों, ऐसा राजा शोक करने योग्य है |

‘सोचिअ बयसु कृपण धनवानू |जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ||’

धनवान होते हुए भी कंजूस है और अतिथि और शिव का भक्त नहीं है, ऐसा वैश्य शोक करने योग्य है |

‘सोचिअ सूद्र विप्र अवमानी |मुखर मान प्रिय ज्ञान गुमानी ||’

ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, स्वयं को ज्ञानी मानकर बकवादी होकर सम्मान की इच्छा रखने वाला शूद्र, शोक के योग्य होता है |

‘वर्ण’ के बारे में भगवद्गीता क्या कहता है ??

‘शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजरवमेव च |ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्मस्वभावजम ||’

अंतःकरण का निग्रह, तप, शौच, शांति, विज्ञान और आस्तिकता ब्राह्मण के सहज स्वाभाव हैं या सहज कर्म हैं |

‘शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम |दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्मस्वभावजम ||’

शौर्य, तेज, युद्ध में स्थिर रहना ….दान क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं |

‘कृषि गौरक्ष वाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम ||’

कृषि, गोपालन, वाणिज्य और व्यापार वैश्यों के स्वाभाविक कर्म हैं और शूद्र का स्वाभाविक कर्म सेवा है |( वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था नहीं समझा जाना चाहिए | )

रामचरितमानस और भगवद्गीता दोनों से हमें इस बात की जानकारी मिली कि पृथक पृथक कर्मो के संपादन हेतु चार प्रकार के वर्णो की व्यवस्था की गयी थी |

‘वर्णसंकर’ क्या है ??       

|गीता के पहले अध्याय में कहा गया है –

‘अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः| स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ||

 ‘संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च| पतन्ति पितरो ह्वेषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया ||’

 ‘दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः| उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||’

इन  श्लोकों के माध्यम से कहा गया है कि वर्णसंकरों द्वारा व्यभिचार में वृद्धि होती है, मानव जाति पर युद्ध और महामारी का संकट आता है, पारिवारिक परंपरा का विनाश होता है, शास्त्रीय सम्मत नियमों का नाश होता है, सनातन-धर्म परंपरा के विखंडन से समाज में अव्यवस्था का फैलाव होता है |

भगवद्गीता  के इन श्लोकों ने मानों वर्तमान परिस्थिति का ही सजीव चित्रण किया है |

इसी को रामचरितमानस अपने शब्दों में कहता है –

‘बरन धरम नहीं आश्रम चारी | स्त्रुति बिरोध बस सब नर नारी ||’

निंदास्पद मनोवृत्तियों में बढ़ोतरी की बात है |

 अब, ज्योतिष के अनुसार बनने वाले ग्रहों के आपसी सम्बन्ध, शुक्र के रूप और ‘ वर्णसंकरों’ का नाश होगा से क्या तात्पर्य है, यह  समझ में आने लगा है |

कहने का तात्पर्य यह कि

युग परिवर्तन होने वाला है |

तमोगुण का विनाश और सत्वगुण का प्रभाव बढ़ेगा |

धर्म की रक्षा होगी |

पारिवारिक परंपरा और संस्कारों में वृद्धि होगी |

धर्म की रक्षा, संस्कारों का सहेजा जाना और त्रिगुणों के संतुलन  का काम सिर्फ और सिर्फ भारत ही कर सकता है| विश्व को जोड़ने की कला सिर्फ भारत के पास है| हम सब आज काल के जिस खंड में हैं वहां ग्रहों द्वारा भारत के लिए वैश्विक मंच पर एक अहम् और निर्णायक भूमिका लिखी जा रही है| वर्ष 2021 से, इसमें अध्यायों का जुड़ना प्रारम्भ होगा, वर्ष  2023 में मंचन प्रारम्भ होगा और वर्ष 2029 /2030 निर्णायक मोड़ पर पहुंचेगा|

विश्व इतिहास में एक नए अध्याय के लिखे जाने की शुरुआत हो रही है| ऐसे में आइये हर पल बदलते ग्रहों के गठजोड़ से, भारत के लिए मिलने वाले शुभ संकेतों में हम सब अपनी अपनी सकारात्मक और संगठनात्मक भूमिका निर्धारित करें| 

@ बी. कृष्णा( कृष्णा नारायण)