या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता| नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तयै नमो नमः

Durga by artist Meenakshi Jha Banerjee | ArtZolo.com
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कुछ लोग, जीवन में हलकी सी कोई लहर आते ही निराशा के चपेट में चले जाते हैं| वे यह सोचने लगते हैं कि, उनके जीवन में कभी कुछ अच्छा घटित ही नहीं होगा| सारी अच्छी घटनाएं दूसरों के जीवन में ही घटित होंगी| निराशावादी व्यक्ति धीरे धीरे अपने आपको हर एक संबंधों से काटता चला जाता है| निराशा इस कदर बढ़ती जाती है कि इसकी वजह से व्यक्ति अवसाद/ विषाद के चपेट में जाता है और यहाँ तक कि आत्महत्या तक कर लेता है|

 तेज रफ़्तार जिंदगी , फटाफट सब कुछ पा लेने की चाहत ने आज सभी को अपने चपेट में ले रखा है |नतीजा असंतुलन | मानसिक असंतुलन , व्यावसायिक असंतुलन , सामाजिक असंतुलन ,भावनात्मक असंतुलन आदि आदि |इन सब की वजह से धीरे धीरे नकारात्मकता अपना पांव पसारने लगता है और व्यक्ति कब उसकी चपेट में चला जाता है वह स्वयं भी नहीं समझ  पाता और जब समझ में आता है तब तक बड़ी देर हो चुकी होती है | नकारात्मकता के चक्रव्यूह में उलझा व्यक्ति फिर तनाव  ग्रस्त होने लगता है और अवसाद में चला जाता है |

भौतिक रूप से इतने विकसित होकर भी, क्या वजह है कि हम मानसिक स्वास्थ्य की धरातल पर फिसलते ही जा रहे हैं?? क्या वजह है कि अपराध के आंकड़े और आत्महत्या के आंकड़ों में लगातार वृद्धि हो रही है?? एक राष्ट्र ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व उन्माद की स्थिति में जा रहा है?? कहाँ चूक रहे हैं हम ?

इसी तरह के तमाम प्रश्नों के जवाब हमें तब तक नहीं मिलेंगे जब तक हम संपूर्णता और समग्रता में चीजों को नहीं देखेंगे….

एक आयामी दृष्टिकोण इसी तरह से आत्महत्या दर आत्महत्या करवाता रहेगा|

देश, काल और पात्र तीनों के बारे में जानना होगा|

 ज्योतिष एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा इस व्याधि को समूल नाश किया जा सकता है| यह एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा समय से पूर्व ही हम अपनी कुंडली के द्वारा, देश( स्थान) काल और पात्र के अध्ययन के द्वारा, जीवन में घटने वाली घटनाओं के बारे में जान पाते हैं| चूँकि हम पहले से इसे जान रहे होते हैं इसलिए इसका उपचार हम तब से प्रारम्भ कर लेते हैं जब इसका बीजारोपण ही हमारे भीतर होता है|

कुंडली से समझने के लिए हमें किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

1 – पंचकोशों ( अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनंदमय कोश), के माध्यम से यह यह देखना कि इस प्रकार के नकारात्मक और निराशावादी विचार का मूल स्त्रोत्र कहाँ है? अर्जुन के पास सबकुछ था पर उन सबके होते हुए भी इन पांचों कोशों के बीच असंतुलन हुआ और वे गहरे अवसाद में गए|

मनोमय कोश और विज्ञानमय कोश के संतुलन हेतु कुंडली में चन्द्रमा( मन) और बुध( बुद्धि) का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें|

पंचकोशों को मैं अपने उदहारण से समझाती हूँ|

एम ए के परीक्षा चल रहा था| पंचम पत्र का परीक्षा देने परीक्षा भवन पहुंची, जब प्रश्न पत्र सामने आया तो एक बार प्रश्नों को पढ़कर लगा कि कैसे इनका जवाब दे पाउंगी| नहीं हो सकेगा हमसे| छह प्रश्न कमोवेश एक जैसे ही लग रहे थे|Bar diagram और Pie Chart, दोनों एक ही नज़र आने लगे| पेट में हलचल सी होने लगी और कंठ सूखने लगा| शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद ये स्थिति होने लगी| अर्थात अन्नमयकोश और प्राणमयकोश के बीच का संतुलन बिगड़ने लगा|

मैंने हौले  से अपनी नज़र परीक्षा भवन में बैठे अन्य परीक्षार्थियों पर डाली| हर कोई भ्रमित अवस्था में दीख रहे थे| मैंने अपने आपको संयत करना शुरू किया| साँसों को संतुलित किया| पानी पीया|  विषय से विपरीत दिशा में जा रही इन्द्रियों को विषयोन्मुख किया|बुद्धि को भ्रमित अवस्था से वापस लौटाया और मन को संयमित किया| मनोमयकोश,विज्ञानमयकोश के बीच का संतुलन बनाया अर्थात मन और बुद्धि में एकात्मता लाई | नए सिरे से प्रश्नपत्र को पढ़ा और विषय वस्तु पर अपना ध्यान केंद्रित करके शांत चित्त होकर एक एक प्रश्नों का उत्तर देना प्रारम्भ किया|  आधा घंटा समय बीत चुका था| मैंने घड़ी की तरफ से अपना ध्यान हटाया और उत्तर देने का क्रम जारी रखा| धीरे धीरे मैं तय समय सीमा में सभी प्रश्नों का उत्तर देकर, परिणाम को भगवान पर छोड़ घर आ गयी|

विश्वविद्यालय परीक्षाफल घोषित हुआ| डर से मैं स्वयं नहीं गयी परिणाम देखने| भैय्या को भेजा| जब वे घर आये तब मिठाई का डब्बा उनके हाथ में था| मिठाई का डब्बा देखकर थोड़ी राहत का सांस लेते हुए मैं उनकी ओर देख रही थी कि कुछ बोलें| उन्होंने हँसते हुए बताया कि सर्वाधिक नंबरों के साथ मैंने विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया है|स्वर्ण पदक प्राप्त किया है|

मैंने भगवान को धन्यवाद देते हुए कहा कि आपने ही,अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश और विज्ञानमयकोश के बीच संतुलन स्थापित करके आनन्दमयकोश तक पहुँचाया|

अगर उस रोज इन पांचों के बीच यह एकात्मता नहीं कायम हो पाता तो आज यह परिणाम नहीं देखने को मिलता|

मैंने श्रद्धा पूर्वक देवी के चरणों में अपना शीश झुकाया|

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता| नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तयै नमो नमः

अपनी अपनी कुंडली को जानिए|

कुंडली का प्रथम भाव अर्थात लग्न भाव से पंचम भाव तक अन्नमयकोश और प्राणमयकोश के अंतर्गत आते है|

छठा भावमनोमयकोश,

सातवां भावविज्ञानमयकोश

आठवां भावआनन्दमयकोश, के लिए देखा जाना चाहिए|

कुंडली के माध्यम से स्वयं को पहचानिये|

 स्वयं में अन्तर्निहित ऊर्जा से सम्बन्ध स्थापित कीजिये|

 इसको जब आप जान लेंगे तो जीवन के किस भाग में जाकर इस प्रकार की समस्याएं आ सकती हैं यह आप भली भांति जान पाएंगे और समय रहते स्वयं में छोटे छोटे परिवर्तनों के द्वारा इस रोग पर विजय प्राप्त करके ऊर्जा से भरपूर नए जीवन की शुरुआत करेंगे| इन सभी के द्वारा आप अपने लक्ष्य तक पहुँचाने वाली मार्ग के बारे में जान सकेंगे|

एक बात याद रखिए कि ईश्वर ने आपके जैसा सिर्फ आपको ही बनाया है| कोई दूसरी प्रति नहीं बनाई है| आप अद्वितीय और अप्रतिम हैं| यह मत सोचिये कि आपके साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है|

इसलिए निराश मत होइए| किसी भी परिस्थिति में जब ऐसा लगने लगे कि यह कार्य हमसे नहीं हो पायेगा तब समझिए कि पंचकोशों के बीच असंतुलन प्रारम्भ हो चुका है| –

इन्हे लय में लाने के लिए आप ये करें  –

  • ईश्वर में श्रद्धा रखिए|
  • निर्भीक होइए|
  • आभासी दुनिया से बाहर आइए|
  • वास्तविकता का सामना कीजिए|
  • मुस्कुराइए|
  • नियमित योग और ध्यान कीजिए|
  • आहार और विचार में परिवर्तन लाइए|
  • जीवन शैली बदलिए|
  • सकारात्मक विचारों का स्वागत कीजिये और नकारात्मक विचारों को सिरे से ख़ारिज कीजिये| याद रखिये कोई दूसरा आपकी मदद नहीं कर सकता| स्थिति को स्वयं के सकारात्मकता के द्वारा काबू में किया जा सकता है|
  • ‘मृत्योर्मुक्षीयमामृतात’ इसका हर वक़्त ध्यान कीजिए|
  • उठिए और हर प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने पुरुषार्थ द्वारा अनुकूल बनाइए|
  • मन और बुद्धि का नियंत्रण अपने हाथ में रखें| नियंता बनें|
  • पंच कोशों के माध्यम से,एक बार आपने शरीर, इन्द्रिय और आत्मा के साथ दोस्ती कायम कर ली फिर दुनिया की कोई भी शक्ति आपको नकारात्मकता की ओर लेकर नहीं जा सकती|
  • तो देर किस बात की – उठिए, जागिये और इन्हे अपना दोस्त बनाइए| इनसे अपना सुख-दुःख साँझा कीजिये| इनसे खूब बतिआइये|
  • अपनी क्षमता पर भरोसा करना सीखिए| निर्भय होइए| अवसाद को दूर भगाइये स्वयं के प्रयास से, बगैर किसी दवाई के सेवन के|
  • विजयी होइए| |
  • देवी माँ से यही प्रार्थना कि मनोमयकोश और विज्ञानमयकोश के बीच का संतुलन बनाए रखें|

अंत में एक बात याद रखिए-

” नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने |

विक्रमार्जितसत्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ||”

शेर को किसी संस्कार के द्वारा जंगल का राजा नियुक्त नहीं किया जाता बल्कि वह अपने बल पर राजपद हासिल करता है|

@ बी. कृष्णा