मादक द्रव्य का सेवन (व्यसन) और युवा पीढ़ी का भटकाव – शास्त्रीय समाधान

What To Do If You Relapse in Addiction Recovery
फोटो, साभार: google

भारतीय युवा पीढ़ी में मादक द्रव्यों का बढ़ता सेवन चिंता का विषय है| यह एक गंभीर समस्या का रूप धारण करती जा रही है| व्यसन क्या है और कैसे स्वयं के प्रयास से इससे मुक्त हुआ जा सकता है इसे आज हमलोग रामचरितमानस और भगवद्गीता के माध्यम से जानेंगे| इसका ज्योतिषीय पक्ष भी देखेंगे और इससे निजात पाने हेतु आत्म प्रबंधन के बारे में जानेंगे|

1 – रामचरितमानस में व्यसन मुक्ति हेतु आत्म प्रबंधन की चर्चा :-

राम, व्यसन के बारे में लक्ष्मण को बताते हुए कहते हैं कि श्रेय (अभीष्ट अर्थ) को व्यस्त (क्षिप्त या नष्ट) कर देता है, इसलिए ‘व्यसन’ कहलाता है|

मानुष व्यसन, दैव व्यसन, क्रोधज व्यसन, कामज व्यसन की चर्चा विस्तार से करते हुए यह चर्चा भी करते हैं कि किस प्रकार के व्यसन से कौन से कार्यों की हानि होती है|अवचेतन मन और चेतन मन की बात करते हुए राम कहते हैं कि किस प्रकार अवचेतन मन में स्थित प्रकृति और संस्कार अपनी गहरी पैठ बनाकर व्यक्ति के चेतन मन को नियंत्रित कर लेते हैं| व्यसन की वजह से व्यक्ति असावधान होता है, गुस्से में आता है, जिद्दी हो जाता है, मन खिन्न होता है, व्याकुलता बढ़ती है और सही-गलत की पहचान खो देता है| इस प्रकार की मनःस्थिति में लिया गया निर्णय विनाश का कारण बनता है|

राजा प्रतापभानु और कैकेयी के माध्यम से व्यसन और उसकी वजह से विनाश लीला का सुन्दर चित्रण किया है तुलसीदास जी ने|

राजा प्रतापभानु को शिकार का व्यसन था और कैकेयी को स्वयं की श्रेष्ठता का अभिमान था| इसे भी तुलसीदास जी ने एक प्रकार का व्यसन कहा है|

व्यसन से मुक्ति का मार्ग रामचरितमानस के अनुसार-

1- बुद्धि के ऊपर मन का लगाम लगाना चाहिए|

2- इन्द्रियों को अपने वश में करना चाहिए|

3- दृढ़ संकल्पित होकर पूर्ण समर्पण और निष्ठा भाव से तप करना चाहिए|

4 -मेरे सामान कोई नहीं है, यह गर्व नहीं होना चाहिए, हनुमान जी की तरह राम का सेवक होने का अभिमान(सात्विक अभिमान) होना चाहिए|

5- मर्यादा का अतिक्रमण करके व्यवहार नहीं करना चाहिए|

6- चित्त की शुद्धि हेतु यज्ञ (योग यज्ञ)करना चाहिए| इसकी वजह से चित्त धीरे धीरे विषय मुक्त होने लगता है और सुधार की प्रक्रिया शुरू होती हे|

इस प्रक्रिया द्वारा अवचेतन मन का विकार दूर होना शुरू होता है और धीरे धीरे चेतन मन भी विकारमुक्त होने लगता है और धीरे धीरे स्वयं के प्रयास से व्यक्ति व्यसन से मुक्त हो जाता है|

भगवद्गीता  में व्यसन मुक्ति हेतु आत्म प्रबंधन की चर्चा :-

अध्याय तीन, अध्याय चार और अध्याय छः में इसकी चर्चा विस्तार से की गयी है| यहाँ भी रामचरितमानस  में कही गयी बातों की पुष्टि की गयी है| चेतन मन और अवचेतन मन की बात करते हुए श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं कि अपनी प्रकृति और संस्कार (राग और द्वेष) की वजह से हम बहुत सारी चीजों को इकठ्ठा करते चले जाते हैं| हम बहुधा इसे जान भी नहीं पाते हैं और यह हमारे चेतन मन पर अपना नियंत्रण बना लेता है| जन्मों जन्मों का इकठ्ठा किया गया यह संस्कार हमें नियंत्रित करता रहता है, इसी राग द्वेष की वजह से हम भिन्न भिन्न प्रकार के व्यसनों के शिकार होते हैं और इस प्रकार पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है|

1- अपनी प्रकृति को पहचानने का प्रयास शुरू करें|

2- अभी तक आप इन्द्रियों के वश में थे अब इस प्रक्रिया को बदलने की कोशिश शुरू करें|मन के द्वारा बुद्धि पर लगाम लगायें और इन्द्रियों को अपने वश में करें|

3- जीवन में आप एक नियत लक्ष्य लेकर आये हैं| इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राग और द्वेष को पहचानें| क्या सही है और क्या गलत है, यह जानें और इस स्तर पर पहुंचकर जब इसकी पहचान हो जाये तो एक निर्णय लें|

4- आरुरुक्ष अवस्था से बाहर आएं और योगरूढ़ कैसे हुआ जाये यह जानें|

5- अपने मनोबल को नीचे न गिरने दें|

6- इन्द्रियविषयों में आकृष्ट होकर अपने आपको पतन के गर्त में नहीं धकेलें| मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करें कि वह तड़क  भड़क की तरफ आकर्षित न हो सके|

7- जड़ पदार्थ से मन श्रेष्ठ है| मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है | जिसने मन को जीत लिया उसने हर व्यसन से मुक्त होने का मार्ग पा लिया|

 ज्योतिषशास्त्र के अनुसार व्यसन के कुछ महत्वपूर्ण योग ( ट्रिगर पॉइंट) और मुक्ति हेतु आत्म प्रबंधन की चर्चा

1- कुंडली में चन्द्रमा का कमजोर होना|

2- कुंडली में बुध का कमजोर होकर चंद्र से सम्बन्ध बनाना|

३- बुध और शनि की युति होना|

४- द्वितीय भाव में राहु और चंद्र की युति होना|

५- कारकांश लग्न से द्वितीय भाव में राहु का स्थित होना|

6- अशुभ चंद्र या अशुभ बुध पर गुरु की दृष्टि हो तो सुरक्षा प्रदान करता है|

बहुत सारे योगों में से ये कुछ महत्वपूर्ण योग हैं जिनके अध्ययन से हम व्यक्ति व्यसन का शिकार हो सकता है या नहीं इसको जान सकते हैं|

दूसरी बात यह कि व्यसन का शिकार अगर होगा तो क्या उसकी व्यसन से मुक्ति होगी यह भी हम दशाओं के क्रम को  देखकर भली भांति जान सकते हैं|

इसको जानने के पश्चात् ज्योतिष भी रामचरितमानस और भगवद्गीता की तरह योगरूढ़ होने का मार्ग दिखाता है|

मनोमयकोश (छठा भाव), विज्ञानमयकोश (सप्तम भाव ) से आनंदमय कोश (अष्टम भाव) तक कैसे पहुंचा जाये यह बतलाते हुए व्यसन मुक्त आनंद की स्थिति कैसे प्राप्त की जाये यह बतलाता है|

इस प्रकार हमने देखा कि रामचरितमानस, भगवद्गीता और ज्योतिष -ये तीनों हमें व्यसन की जानकारी तो देते ही हैं साथ में बगैर किसी दवाई के स्वयं के प्रयास से चित्त शुद्धि करके, किस प्रकार व्यसनमुक्त हुआ जाये यह भी बतलाते हैं|

आइये मूल की ओर लौटें और हर प्रकार के व्यसनों ( दैव व्यसन छोड़ कर) से मुक्ति पाएं|

@बी कृष्णा