श्राद्ध का महत्व

Pitru Paksha 2020 Shradh Rules : Pitru Paksha 2020 Dos And Donts In  Shraddha Paksha, Pitru Paksha Ke Niyam, श्राद्ध के नियम, पितृ पक्ष में क्या  नहीं करना चाहिए, | Pitru Paksha
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श्राद्ध (सर्वे भवन्तु सुखिनः)

श्रद्धां दीयते, श्रद्धां क्रियते, श्रद्धां अनुमियते श्राद्धं|

श्राद्येषु पितरं तृप्तः|

प्रत्येक वर्ष भादो माह में अपने पितरों के तृप्ति हेतु और उनके सुखी होने की कामना से श्राद्ध किया जाता है|

 यहाँ सिर्फ पितरों के तृप्त और सुखी होने की कामना नहीं की जाती है बल्कि देव, ऋषि, दसों दिशाएं, ऋतु और यहाँ तक कि यम के तृप्त और सुखी होने की कामना से उन्हें जल दिया जाता है|

यमादया पितरः |

यमादिभ्यो नमः || 

सर्वे भवन्तु सुखिनः और श्रद्धा भाव दो मूल मन्त्र पकड़ता है हमें श्राद्ध|

श्राद्ध को लेकर शास्त्रीय कथन क्या है? इसके पीछे का वैज्ञानिक रहस्य क्या है ? तर्पण की विधि क्या है और कौओं को खाना खिलाये जाने के पीछे का रहस्य क्या है, इन सभी बातों को हमलोग जानेंगें|

शास्त्रीय आधार :-

मार्कण्डेय पुराण में ऋतुध्वज अपनी पत्नी मदालसा को कहते हैं कि पुत्रों को प्रवृत्ति मार्ग में लगाओ| ऐसा करने से कर्म मार्ग का उच्छेद नहीं होगा तथा पितरों के पिंडदान का लोप नहीं होगा| जो पितर देवलोक में हैं , तिर्यक योनि में जो परे हैं ,वे पुण्यात्मा हो या पापात्मा ,जब भूख ,प्यास से विकल होते हैं तो अपने कर्मो में लगा हुआ मनुष्य पिंडदान द्वारा उन्हें तृप्त करता है| तब मदालसा अपने पुत्र अलर्क को श्राद्ध कर्म के बारे में बतलाते हुए कहती हैं कि मृत्यु के पश्चात् जो श्राद्ध किया जाता है उसे औरघवदैहिक श्राद्ध कहते हैं|

व्यक्ति जिस दिन ( तिथि में ) मरा  हो ,उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध करना चाहिए|

एक ही पवित्रक का उपयोग किया जाता है| अग्निकरण की क्रिया नहीं होती| ब्राह्मण के उच्छिष्ट के समीप प्रेत को तिल और जल के साथ अपसव्य होकर ( जनेऊ को दाहिने कंधे पर डालकर )उसके नाम गोत्र का स्मरण करते हुए एक पिंड देना चाहिए|

तत्पश्चात हाथ में जल लेकर कहें  – ‘ अमुक के श्राद्ध में दिया हुआ अन्न-पान आदि अक्षय हो यह कहकर वह जल पिंड पर छोड़ दे ,फिर ब्राह्मणो का विसर्जन करते समय कहे ‘ अभिरंबताम’ ( आपलोग सब तरह से प्रसन्न हों )|

उस समय ब्राह्मण लोग कहें  ‘अभिरता स्मः ‘( हम भली भांति संतुष्ट हैं )|

 श्राद्ध में विषम संख्या में ब्राह्मणो को आमंत्रित करे| पिता ,पितामह और प्रपितामह इन तीनो पुरुषों को पिंड के अधिकारी समझना चाहिए| यही बात मातामहों के श्राद्ध में भी होना चाहिए|

पितृश्राद्ध में बैठे हुए सभी ब्राह्मणो को आसन के लिए दोहरे मुड़े हुए कुश देकर उनकी आज्ञा ले विद्वान पुरुष  मन्त्रोच्चारपूर्वक पितरों का आवाहन करे और अपसव्य होकर पितरों की प्रसन्नता के लिए तत्पर हो उन्हें अर्घ्य निवेदन करे .इसमें जौ के स्थान पर तिल का प्रयोग करना चाहिए|

नमक से रहित अन्न लेकर विधिपूर्वक अग्नि में आहुति दें| ‘अग्नये कव्यवाहनाये स्वाहा ‘ इस मन्त्र से पहली आहुति दें, ‘ सोमाय पितृमते स्वाहा ‘ इस मंत्र से दूसरी आहुति दें तथा ‘यमाये प्रेत्पतये स्वाहा ‘इस मंत्र से तीसरी आहुति दें |

आहुति से बचे हुए अन्न को ब्राह्मणो के पात्र में परोसें फिर विधिपूर्वक जो जो अन्न उन्हें अत्यंत प्रिय लगे वह वह उनके सामने खुशीपूर्वक प्रस्तुत करें | ब्राह्मणों को आग्रहपूर्वक भोजन कराएं|

उनके भोजनकाल में रक्षा के लिए पृथ्वी पर तिल और सरसो बिखेर दे और रक्षोग्न मन्त्र का पाठ करें क्योंकि श्राद्ध में अनेक प्रकार के विघ्न उपस्थित होते हैं| अंत में यथा शक्ति दान देकर ब्राह्मणो से कहें ‘ सुस्वधा अस्तु ‘( यह श्राद्धकर्म भली भांति संपन्न हो ) ब्राह्मण भी संतुष्ट होकर कहें ‘ तथास्तु ‘इसके बाद उनका आशीर्वाद लें और उन्हें विदा करे ,तत्पश्चात अथितियों को भोजन कराएं| इसके बाद बचा हुआ भोजन यजमान ग्रहण करें|

भादो माह में मनाये जाने वाले श्राद्ध का वैज्ञानिक आधार :-

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य का कन्या राशि में जब गोचर हो रहा होता है या सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करने वाला होता है  तब श्राद्धकर्म किया जाता है | इसे पितृपक्ष कहते हैं | सारे व्रत और त्योहार सूर्य और चन्द्रमा के परस्पर संबंधों पर आधारित हैं पर यह सिर्फ सूर्य पर आधारित है | ज्योतिष्शास्त्र ने हज़ारों वर्ष पूर्व सूर्य के कन्या राशि में गोचर के साथ पितरों की चर्चा की| यह विज्ञान सम्मत भी है| कैसे ,आइये जाने -पृथ्वी और अन्य ग्रह सूर्य के चारो तरफ चक्कर लगाते हैं .सूर्य आकाशगंगा के चारो तरफ घूमता है और कई आकाशगंगाओं का समूह जिस तारामंडल के चारो तरफ घूमते हैं उस तारामंडल की गति दिशा कन्या राशि की तरफ होती है ,इसे विज्ञान virgo(कन्या) super cluster कहता है|रांची में अभी भी आदिवासी जाति है जो हर तीसरे वर्ष अपने पितरों को तृप्त करने हेतु पूजा करते हैं| वे जिस समय पूजा करते हैं सूर्य कन्या राशि में आ चुका होता है|

है न आश्चर्य की बात कि आज विज्ञान जिस बात को स्वीकार रहा है ,ज्योतिषशास्त्र हज़ारो वर्ष पूर्व ही उसका दर्शन करा  चुका है| उन्होंने इस मार्ग को पितृमार्ग कहा| इसका सारगर्भित अर्थ यह कि पितृमार्ग अर्थात जनम -मरण-जनम -का चक्र|

कौओं को खाना खिलाने के पीछे का सारगर्भित अर्थ :-

आस्था और जीवन से जोड़ है यह|  पीपल के बीज को कौए जब खाकर मल द्वारा बाहर निकालते हैं  तभी पीपल(जिसे अमृत पेड़ कहा गया है) के बीज से पौधा निकल पाता है| और यह ज्ञान हमें किताबों से नहीं मिलता वरन  प्रकृति से जुड़कर मिलता है|

इतना सारगर्भित है यह| आस्था के साथ साथ प्रकृति से तो जोड़ता ही है, हर एक के तृप्त और सुखी होने की कामना श्रद्धा पूर्वक करने का पाठ पढ़ाता है|

@बी. कृष्णा