चाँद ( MOON)- ज्योतिष में इसकी इतनी महत्ता क्यों ?

Why does the Moon's appearance change? - skyatnightmagazine

किसी ने चाँद में अपनी महबूबा को देखा तो किसी ने चाँद में अपने मामा को देखा|

किसी ने स्त्री माना तो किसी ने पुरुष माना|  

देव गुरु बृहष्पति के शिष्य चाँद की ख़ूबसूरती पर गुरु पत्नी तारा इस कदर रीझ गयीं कि चाँद के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लिया| दोनों के इस संबंध से बुध की उत्पत्ति हुई|

चाँद अगर न हो तो तिथियां न हों|

चाँद अगर न हो तो काल न हो|

चाँद काल भी है और कालातीत भी है|

छान्दोग्य उपनिषद में इसे दिव्य चक्षु कहा गया है|

छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार सूर्य और चाँद अगर न हो तो औषधियां न हो|

चाँद को जितना भी समझने का प्रयास करती, उतना ही उलझती जाती|

भगवत गीता के बारहवें अध्याय को पढ़ते हुए अचानक से दिमाग की बत्ती जली और चाँद की महत्ता दृष्टिगोचर होने लगी|

जीवन के GPS – ज्योतिष ने चाँद को बहुत महत्व  दिया है| ज्योतिष में चाँद( MOON) को मन कहा गया है| तैत्तरीय उपनिषद में मन में ही वेदों को प्रतिष्ठित माना है| आड़ी, तिरछी खींची गयी रेखाओं के मध्य बैठे ग्रहों को गति प्रदान करने वाला चाँद है जो दशाओं के माध्यम से इसे गति प्रदान करता है| अर्थात दशाओं के शुरुआत के लिए चंद्र के नक्षत्रों की महत्ता पर बल दिया गया है| भिन्न भिन्न प्रकार के ज्योतिषीय चक्रों और योगों की चर्चा चाँद के माध्यम से की गयी है| ज्योतिष ने हज़ारों वर्ष पूर्व जिस सूत्र का सूत्रपात किया उस  सूत्र का भगवतगीता न सिर्फ  समर्थन करती है वरन उसकी व्याख्या भी करती है| उसी सूत्र का जिक्र अब Meta Physics करने लगा है| अभी भी वह इसकी व्याख्या नहीं कर पाता है| इतना कह कर छोड़ देता है कि – “ There is a definite relation between the body consciousness and the moon.”

इसकी सार गर्भित व्याख्या गीता के माध्यम से आइये जानें –

मन क्या है ?

सामान्य भाषा में मन शरीर का वह हिस्सा या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है।

ईश्वर की सृष्टि रचना के मूल में माया है परन्तु जीव द्वारा रची गयी रचना के मूल में मन है| यह काल भी है, कालातीत भी है|

मन की क्षमता क्या है?

मन के क्षमता की बात करते हुए कहा गया है कि इसमें इतनी क्षमता है कि यह जिसका भी चिंतन करे उसके अनुरूप हो जाता है और धीरे धीरे मन इतना क्षमतावान हो जाता है कि जिस रूप में चाहे अपने आप को उस रूप में व्यक्त कर सकता है| दूसरे के मन के भाव को समझने लगता है और भविष्य में जो घटनाएं घटने वाली हैं इसका भी इसे ज्ञान हो जाता है|

मन के अंतर्गत चित्त की बात कही गयी है|

 चित्त क्या है ?

यहाँ दो शब्द मिले – चित और चित्त

चित का अर्थ मिला – consciousness (चेतना)|

 इसी consciousness के साथ जब विषय का जुड़ाव हो जाता है तो वह चित्त कहलाता है|

 विषय क्या है??

‘ विषम यति इति विषयः’ – जो विष के नज़दीक पहुंचा देता है वह विषय है|

विषय में आसक्ति होती है|

आँखों से देखा, आसक्त हो गए…….

कानों से सुना, आसक्ति आ गयी……

स्वाद लिया, आसक्त हो गए……….

आदि आदि |

विष क्या है ?

उदाहरण के लिए   

‘ वृद्धस्य तरुणी विषम ‘

एक वृद्ध के लिए तरुणी विष है|

इसी प्रकार से हर व्यक्ति के लिए विष का निर्धारण है| कोई विष व्यक्ति के यश को मारता है, कोई विष शरीर को मारता है, कोई विष लाभ को मारता है तो कोई विष नशे को मारता है|

चित का आसक्ति से जुड़ जाने की  वजह से जितनी भी घटनाएं या दुर्घटनाएं मनुष्य के जीवन में घटीं उन सबका परिणाम कब और कैसे घोषित करना है यह कार्य मन पर निर्भर है| मनुष्य द्वारा किये गए सारे क्रियाकलापों को मन, चित्त रूपी पिटारे में सहेज कर रखता चला जाता है |अर्थात चित्त एक ऐसी पिटारी है जिसमें हमारे जन्मों जन्मों के संस्कारों का लेखा जोखा संग्रहीत है| ठीक वैसे ही जैसे DNA, जिसके लिए कहा जाता है कि DNA encodes all genetic information and is the blueprint from which all biological life is create.

चित्त का स्वभाव है – अवधारणा अर्थात to hold |

मन के अंतर्गत चित्त है और इसी चित्त में जन्मों जन्मों के संस्कार सहेजे गए हैं|

मन की गति भूत, वर्तमान और भविष्य में है| त्रिकालदर्शी है यह| इन्द्रिय के माध्यम से जिन चीजों को हम नहीं देख पाते उन्हें देखने की क्षमता भी मन में है| इसकी इसी क्षमता की वजह से स्वप्न में बहुत सारी जीज़ों का निरूपण होता है| सूक्ष्मता  से विश्लेषित करने का सामर्थ्य रखता है यह| इस प्रकार चाँद काल भी है और कालातीत भी है|

इतनी सारी क्षमताओं वाला है मन| ज्योतिष जिसे चाँद के रूप में निरूपित करता है| 

अब बात सूर्य के साथ इसके सम्बन्ध की|

ज्योतिष में सूर्य को आत्मा कहा गया है और योग वशिष्ठ के अनुसार  “मननी शक्ति से युक्त आत्मा ( sun) का नाम मन (moon)है”| मननी शक्ति अर्थात thoughtful energy.

उपनिषद के अनुसार सूर्य और चंद्र के संबंध को एक उदहारण से देखते हैं|

मान  लिया कि अभी मेरी इच्छा हुई कि मैं घूमने जाऊं| घूमने जाने की इच्छा होते ही चित्त चंचल हो गया|

अब अगर मेरी यह इच्छा पूर्ण कर दी गयी तो फिर कोई अन्य इच्छा प्रकट हो गयी|

इस प्रकार से कोई न कोई कामना पलती रही|

परिणाम क्या हुआ??

चित्त में चंचलता आ गयी|

जब तक चित्त  में चंचलता रहेगी तब तक चंचल चित्त रूपी दर्पण पर सुख स्वरुप आत्म तत्व व्यक्त नहीं होगा | आत्म तत्व तभी व्यक्त होगा जब कामना की निवृत्ति हो जाये| मतलब मन की चंचलता, चित्त की चंचलता समाप्त हो जाये| मन स्थिर हो जाये|

चित्त की चंचलता कैसे दूर हो?

सांसारिक भोग विलास से अपना ध्यान धीरे धीरे हटाकर परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करने से मन की चंचलता कहें या चित्त की चंचलता कहें, दूर होने लगता है| भगवतगीता के छठे अध्याय में मन, चित्त की शुद्धि हेतु किये जाने वाले प्रयासों की विस्तृत चर्चा की गयी है|

कामना पालते रहना भौतिकता है और इससे निवृत हो जाना आध्यात्मिकता|

चित्त की चंचलता भौतिकता है और चित्त की स्थिरता आध्यात्मिकता|

कहने का मतलब यह कि मन की चंचलता के वजह से मनुष्य बार बार जन्म लेता है| मन ही अपूर्ण वासनाओं के कारण, पुनः-पुनः जन्म की आकांक्षा करवाता है। और जब इस मन की चंचलता समाप्त हो जाती है, स्थिरता आ जाती है तब आत्मा सक्रीय हो जाता है| पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है|

मन (चाँद), जिस पिटारी में सारे संसार को समेट कर रखता जाता है उस पिटारी को अपनी पीठ पर लादकर, सूर्य के सहारे चलता जाता है और तय समय पर तय व्यक्तियों तक, संस्कारों के रूप में संजोयी गयी उनके सामान को अपने पिटारी में से निकाल कर देता जाता है|

इस प्रकार सूर्य और चाँद की यात्रा और हमारी जीवन यात्रा चलती रहती है ….. अनवरत

ज्योतिष के मनीषियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व मन की महत्ता को चाँद के माध्यम से पहचान लिया था| वे यह भी भली भांति समझ गए थे कि मन का सदुपयोग करें तो हम सर्वश्रेष्ठ हो जाएं| मन अगर शुद्ध हो तो काल के साथ साथ जो कालातीत है उसकी भी प्राप्ति हो जाती है| वे यह भी समझ गए थे कि  चाँद को  अगर सूर्य का साथ मिल जाये तो जन्म जन्म के भवसागर से मुक्ति मिल जाये|

जीवन के GPS – ज्योतिष के माध्यम से अपनी अपनी कुंडली में चाँद को जानिए और जीवन को गति दीजिये|

@ बी. कृष्णा