‘गीता’ और नैदानिक मनोविज्ञान (Clinical Psychology)

Bhagavad Gita Shlok: Bhagwat Geeta Saar In Hindi - Bhagwat Geeta ...

ज्योतिष को अपरा ( चारों वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष ) और परा के बीच का सेतु कहा गया है |चारों वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और तब आता है ज्योतिष |कहने का तात्पर्य यह कि ज्योतिष को अगर सम्पूर्णता में समझना है तो हमें वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद को जानना होगा |

जानने और सीखने की इसी प्रक्रिया में आज हम चलेंगे महाग्रंथ गीता के पास और मनोविज्ञान की सीख प्राप्त करेंगे |हमारे पूर्वजों ने हजारों हजार वर्ष पूर्व अद्भुत काम किया है और हम क्या कर रहे हैं ?? हमें इनपर तो भरोसा ही नहीं | इनकी कही हुई बातें जब पश्चिम से होकर हम तक पहुँचती  हैं तब हम उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं| अमेरिका के एक प्रसिद्ध Educator, Author, Businessman and keynote स्पीकर थे, इन्होने ‘गीता’ के इन्हीं सिद्धांतों को अपने नाम से इस्तेमाल किया | उन्होंने ‘गीता’ का जिक्र तक नहीं किया | काम हमारे पूर्वजों का और नाम किसी और का |

आइये अबगीताकी ओर चलें और सीखें

महाभारत युद्ध आरम्भ हो चुका था |  पराक्रमी अर्जुन की सहायता के लिए उनके रथ पर हनुमान और कृष्ण दोनों उपस्थित थे फिर भी एक क्षण में अर्जुन की जो मनोदशा हुई कि वे  अपना गांडीव रख देते हैं और युद्ध लड़ने से इंकार कर देते हैं | इस युद्ध में उनके सारथी ,श्री कृष्ण उनकी इस मनोदशा को भांप कर, उनका भली भांति उपचार करते हैं |यह नैदानिकमनोवैज्ञानिकों के लिए आज भी अनुकरणीय है |

(यहाँ कुछ श्लोक ही दिए जा रहे हैं)

तान्समीक्ष्य कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितां |

कृपया पर्याविष्ठो विषीदन्निम्ब्रावित ||’

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम |

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं परिशुष्यति ||’

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते |

गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ||’

शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव मे मनः |

निमित्तानि पश्यामि विपरीतानि केशव ||’

इन श्लोकों के आधार पर अर्जुन में जो लक्षण परिलक्षित होते हैं वे हैं

गहरी चिंता

भय होना

अवसाद

मुंह सुखना

पैर कांपना

घबराहट

पसीना आना

सिर चकराना,

 रोगी (अर्जुन) की मनोदशा की बखूबी पहचान की श्री कृष्ण ने और उपचार शुरू किया |

उपचार का तरीका

1 रोगी के मनोविज्ञान को भली भांति समझ जाना |

2 एक ही बैठक में इलाज की प्रक्रिया को पूरा करना | ऐसा नहीं कि आज का सेशन आधे घंटे या एक घंटे का हो गया अब दूसरे दिन आना |तात्पर्य यह कि काउंसलिंग के दौरान समय की कोई प्रतिबद्धता नहीं |चाहे जितना लम्बा चले पर समाप्त तो एक ही सेशन में करना है | मनोरोगी को एक फ्रेम से दूसरे फ्रेम में जाने की फिलहाल अनुमति नहीं |

3 उपचार के दौरान हर क्षण श्री कृष्ण अर्जुन के साथ रहे अर्थात मनोरोगी को अकेला नहीं रहने देने की सीख मिलती है |

4 श्री कृष्ण पर अर्जुन का पूर्ण विश्वास है अर्थात उपचार करने वाला ऐसा हो जो मनोरोगी को अपने भरोसे में ले ले |

डॉक्टर और रोगी के बीच कैसा सम्बन्ध होना चाहिए इसे बहुत ही सरलता से समझाया गया है |

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवनि गृह्यति नरोपराणि |

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि

संयाति नवानि देही ||’

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

अहं त्वां सर्वपापेभ्योः मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||’

श्री कृष्ण अर्जुन को समझते भी हैं और समझाते भी हैं| उनको उनके कर्तव्यों का बोध करवाते हैं |उनके पराक्रमी होने का भान करवाते हैं |उन्हें मोह से उबारते हैं और कहते हैं कि ये सारी घटनाएं पहले ही घटित हो चुकी हैं | तुम तो सिर्फ एक निमित्त मात्र हो| उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं कि मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास रखो| उन्हें उनके मनोविकारों पर विजय प्राप्त करना सिखाते हैं |

कृष्ण ने वगैर किसी दवाई के अर्जुन जैसे गहरे विषाद  में चले गए मनोरोगी को ठीक कर दिया |

मनोरोग मुक्त होने के पश्चात् अर्जुन कहते हैं –

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |

स्थितोस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ||’

अब मेरा मोह दूर हो गया है|आपके अनुग्रह से मेरी स्मरण शक्ति मुझे वापस मिल गयी है| मैं संशयरहित तथा दृढ हूँ और आपके आदेशानुसार कर्म करने के लिए उद्यत  हूँ |

भविष्य में चिकत्सा पद्धति कैसी हो ,इसका मार्गदर्शन करते हैं श्री कृष्ण |

आजकल के डॉक्टरों के लिए महत्वपूर्ण सीख है| वे मनोरोगियों को भारी मात्रा में ट्रैंक्विलाइज़र देते हैं |

सिलसिलेवार ढंग से मनोरोग के कारण को जानकर उसका निदान एक बैठक में और बगैर किसी औषधि के (औषधि मुक्त चिकित्सा पद्धति) |

अद्भुत उपचार किया कृष्ण ने

आइये अपने मूल की तरफ लौटें| पूर्वजों के पास बैठें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें| जीवन को शांतिपूर्ण और खुशहाल बनाएं|

शुद्ध हों ! बुद्ध हों !! प्रबुद्ध हों !!!

@ बी कृष्णा