परमाणु- पालक भी, संहारक भी

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ज्योतिष को अपरा (चारों वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष )और परा के बीच का सेतु कहा गया है |चारों वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और तब आता है ज्योतिष |कहने का तात्पर्य यह कि ज्योतिष को अगर सम्पूर्णता में समझना है तो हमें वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद को जानना होगा |

COVID-19 विषाणु संक्रमण को लेकर आजकल RNA और PROTEIN – इन दो शब्दों से सभी परिचित हो चुके हैं | RNA, DNA के एक कार्यकारी खंड GENE द्वारा निर्मित किये जाते हैं | ये GENE पहले RNA  बनाते हैं और फिर RNA  से प्रोटीन का निर्माण करते हैं |

इसको ऐसे जाने –

कोशिका – डीएनए – जीन – आरएनए – प्रोटीन

शोधरत वैज्ञानिक, कोशिका से इस कड़ी की शुरुआत करके आगे बढ़ रहे हैं |

इस कड़ी को थोड़ा दुरुस्त करें तब जो कड़ी तैयार होगी वह होगी –

परमाणु – अणु- कोशिका – डीएनए – जीन – आरएनए -प्रोटीन

अर्थात सूक्ष्मतम कड़ी होगी –परमाणु |

आज हम परमाणु को – दर्शनशास्त्र, सांख्य और गीता के माध्यम से जानेंगे |साथ ही साथ, इलेक्ट्रान,प्रोटोन और न्यूट्रॉन, विज्ञान जिसे subatomic particles कहता है, उसे भी गीता के माध्यम से डिकोड करने की कोशिश करेंगे |

हमलोग क्रम से इसे जानेंगे –

1 –दर्शनशास्त्र के अनुसार –

 कणद ऋषि के वैशेषिक दर्शन सिद्धांत के अनुसार-

A –  पृथ्वी, जल, तेज, वायु का सूक्ष्मतम विभाग जो इन्द्रिय गोचर नहीं है वह परमाणु है| सूक्ष्मतम विभाग, जिससे अधिक सूक्ष्म रूप की कल्पना नहीं की जा सकती, वह परमाणु है |

B – परमाणुओं में विघटन नहीं होता |

C – दूसरे परमाणु के साथ मिलकर निर्माण करने की इसकी स्वाभाविक प्रक्रिया होती है |

D – परमाणु अलग अलग तरीके से अलग अलग कारकों की उपस्थिति में रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं और भिन्न भिन्न प्रकार के बांड्स का निर्माण करते हैं |

कणद ऋषि, आगे इन परमाणुओं के चार प्रभेद बताते हैं

पृथ्वी के परमाणु, जल के परमाणु, तेज के परमाणु और पवन के परमाणु |

इसको और विस्तृत करते हुए ऋषि जब आगे बढ़ते हैं तब इन सभी को विभाजित करने वाली बिंदुओं की चर्चा करते हैं जिसके आधार पर हम सहजता से यह जान पाते हैं कि कौन सा परमाणु पृथ्वी का परमाणु है, कौन सा परमाणु जल का परमाणु है, कौन सा परमाणु तेज या प्रकाश का परमाणु है और कौन सा परमाणु वायु का परमाणु है |

इन गुणों के आधार पर व्यवहार का सञ्चालन करते हैं |

कणद ऋषि के अनुसार चारों भूतों के परमाणु स्वतंत्र हैं | वे कार्य कारण सिद्धांत को नहीं मानते हैं |

कणद ऋषि आगे बहुत ही विस्तार से अन्य बातों की चर्चा करते हैं | इसे यहीं विराम  देते हैं और आगे बढ़ते हैं | कणद ऋषि के दर्शन में आकाश के परमाणु की चर्चा नहीं है |

2 – सांख्य के अनुसार

कणद ऋषि, परमाणु की चर्चा करते करते जहाँ ठहर जाते हैं सांख्य उससे आगे चलता है |पृथ्वी के परमाणु, जल के परमाणु, तेज के परमाणु और वायु के परमाणु के साथ साथ आकाश के परमाणुओं की भी चर्चा करते हुए गणितीय रूप से 1 – 1 = 0 को सिद्ध करते हैं (यही वो कड़ी है जिसे  कणद ऋषि ने छोड़ दिया है )

शून्य और एक, इसी पर आधारित है कंप्यूटर का अविष्कार| काम हमारे ऋषिओं का, नाम किसी और का |

आकाश की भी उत्त्पति मानते हैं यहाँ |

सांख्य, कार्य कारण सिद्धांत को मानता है|

इसे भी यहीं विराम देते हैं और चलते हैं गीता के पास और जानते हैं कि वह क्या कहती है परमाणु के बारे में –

3 – गीता के अनुसार

 ‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च |

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चांतीके च तत ||

परमाणु समस्त जीवों के बाहर तथा भीतर स्थित है | सूक्ष्म होने के कारण भौतिक इन्द्रियों द्वारा जानने या देखने से परे है|

अब दूसरा श्लोक देखें –

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम |

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च |

वह कभी भी विभाजित नहीं है| यद्यपि वह सभी जीवों का पालनकर्ता है लेकिन यह समझना चाहिए कि वह सबों का संहारकर्ता है |

( परमाणु -पालक भी ,संहारक भी )

अद्भुत  वर्णन करता है गीता |

बात पालन की करता है और संहार की भी करता है अर्थात शरीर के भीतर और बाहर प्रदुषण और उससे होने वाले नुकसान की ओर संकेत तो करता ही है साथ ही साथ परमाणु बम की ओर भी संकेत करता है| संहार की बात करते हुए कहता है –

‘कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो ‘ 

यहाँ काल से समय भी और मृत्यु भी, दोनों अर्थ बतलाते हुए कहा गया है कि समस्त जगत को विनष्ट करने वाला मैं काल ( मृत्यु, समय ) हूँ |

और फिर परमाणु बम को और भी विस्तार देते हुए गीता में कहा गया है –

‘ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ‘

विस्फोट होने से मानों आकाश में हज़ारों सूर्य एकसाथ उदय हों |

गीता इससे भी आगे जाकर sub-atomic पार्टिकल, इलेक्ट्रान,प्रोटोन और न्यूट्रॉन की चर्चा करता है| इसे मैं अभी समझने की कोशिश कर रही हूँ |आप सभी जो इसे पढ़ रहे है, उनसे यह आग्रह कि अपने-अपने स्तर से इलेक्ट्रान,प्रोटोन और न्यूट्रॉन को समझकर यहाँ साझा करें (गीता के परिप्रेक्ष्य में ) |

सत्व गुण, रजस गुण और तमो गुण के माध्यम से गीता में इन तीनों को समझाया गया है |

बहुत ही विस्तार से इसकी चर्चा की गयी है| यहाँ संक्षेप में जानें |

सत्व गुण और तमो गुण स्वतः सक्रीय नहीं हैं | कहने का तात्पर्य यह कि वे स्वयं क्रियाशील नहीं होते |रजो गुण को क्रियाशील बताते हुए यह कहा गया है कि यह जिस गुण की तरफ मुड़ जाता है उस गुण को सक्रीय कर देता है | अर्थात अगर सत्व गुण की तरफ मुड़ता है तो सत्व गुण को सक्रीय कर देता है और तमो गुण की तरफ मुड़ता है तो तमो गुण को सक्रीय कर देता है |

इनके आधार पर हम सत्व  गुण और तमो गुण को ‘न्यूट्रॉन ‘ कह सकते है क्योंकि ये स्वतः सक्रीय नहीं है |

रजो गुण, इलेक्ट्रान और प्रोटोन दोनों हो गया |

विज्ञान जहाँ बहुत से बातों का जवाब देने में असमर्थ है वहींसभी बातों का सारगर्भित जवाब हमारे शास्त्रों में वर्णित है जिसे हमारे ऋषिओं ने हज़ारों वर्ष पूर्व अपने अध्ययन से जान लिया है | विज्ञान,परमाणु के बारे में अभी तक स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कह पाया है | नित इसे पुनर्परिभाषित करता है | Dalton  ने परमाणु का जो सिद्धांत दिया, काल क्रम से उसे भी कई बार बदला जा चुका है | आकाश तत्व को परिभाषित करने में तो वह अभी तक सफल नहीं हो पाया है| वहीं हमारे महर्षिओं ने न सिर्फ आकाश तत्व को परिभाषित किया बल्कि उसके परमाणुओं की भी चर्चा की है |Multi Universe Theory का जवाब भी हमारे ऋषिओं ने हज़ारों वर्ष पूर्व देते हुए कितने ब्रह्माण्ड है इसको बता दिया है |

 जरूरत है शास्त्रों से जुड़ने का …..

सही और गलत के भेद  को, न सिर्फ पहचानने का बल्कि उसे स्वीकारने का भी और उनसे सबक लेकर शास्त्र सम्मत प्रयास किये जाने का | और तब जो परिणाम प्राप्त होगा वह सम्पूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी होगा, आनंदप्रद होगा |

तो देखा आपने कितना व्यापक है ज्योतिष |

मैंने पहले भी कहा है और अभी भी कह रही हूँ कि ज्योतिष केवल ज्योतिषशास्त्र के किताबों में नहीं है बल्कि समस्त विधाओं में बिखरा पड़ा है | ऐसे ही थोड़े न इसे ‘सेतु’ कहा गया है| वह भी कहाँ का सेतु ?? अपरा और परा के बीच का सेतु| साक्षात् परम से जोड़ने वाली विधा है यह| इसके नाम पर की जाने वाली ठगी को भी पहचानने की जरूरत है |

‘ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्चयते |

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम ||’

निज शोध जारी है ….

@ B Krishna

9910400118