रे मन धीरज धर

Cosmic 'hotspots' may be relics of a universe that existed before ours

   30 जून 2020 को ग्रहों द्वारा कुछ ऐसे योग निर्मित हो रहे हैं जिनके बारे में ज्योतिषशास्त्र अन्य फलों के अलावा एक फल जो कहता है वह यह कि इस योग के निर्माण से वर्णसंकरों का नाश होता है |

‘ वर्णसंकर’ शब्द का इस्तेमाल शास्त्रकारों ने क्यों किया ??

 क्या तात्पर्य है ??

इसे समझने से पहले यह समझना आवश्यक है किवर्णसंकर होता क्या है ?? अपने प्रश्नों में उलझी हुई मैं रामचरितमानस के शरण में गयी, जहाँ मुझे कुछ प्रश्नोंके उत्तर मिले, साथ ही साथ महाभारत में जाने का दिशा निर्देश मिला |

इन्हीं बिंदुओं को अपना आधार बनाकर मैंने अपना कदम आगे बढ़ाया है | महर्षिओं द्वारा, पूर्व में जलाये गए मशाल की रौशनी में  ‘वर्णसंकर’ को आज के परिवेश में ज्योतिषीय  रूप में  देखने का एक प्रयास किया है |

वर्णसंकर – ‘वर्ण’ और ‘संकर’ से मिलकर बना है |

पहले  हमवर्णको जानें |

मानस में वर्ण धर्म की चर्चा स्वधर्म के रूप में की गयी है |

मानस क्या कहता है वर्णों के बारे में, आइये जाने |

‘ वर्णाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग |

चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहि भय सोक न रोग ||’

गुरु वशिष्ठ द्वारा वर्णाश्रम धर्म का वर्णन इस प्रकार किया गया है –

‘ सोचिअ विप्र जो बेद बिहीना |

तजि निज धरमु विषय लयलीना ||’

ब्राह्मण के धर्म का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वेद ज्ञान से शून्य और विषय सेवन में लगा ब्राह्मण शोक करने योग्य है |

‘ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना |

जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना ||’

नृपति कहके एक तरह से क्षत्रिय धर्म की चर्चा की गयी  है और कहा गया है कि नीति से शून्य हो और प्रजा जिसे प्राण के समान प्रिय नहींहों, ऐसा राजा शोक करने योग्य है |

‘सोचिअ बयसु कृपण धनवानू |

जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ||’

धनवान होते हुए भी कंजूस है और अतिथि और शिव का भक्त नहींहै, ऐसा वैश्य शोक करने योग्य है |

‘सोचिअ सूद्र विप्र अवमानी |

मुखर मान प्रिय ज्ञान गुमानी ||’

ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, स्वयं को ज्ञानी मानकर बकवादी होकर सम्मान की इच्छा रखने वाला शूद्र, शोक के योग्य होता है |

अब आइये जाने कीवर्णके बारे में गीता क्या कहता है ??

‘ शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजरवमेव च |

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्मस्वभावजम ||’

अंतःकरण का निग्रह, तप, शौच, शांति, विज्ञान और आस्तिकता ब्राह्मण के सहज स्वाभाव हैं या सहज कर्म हैं |

‘शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम |

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्मस्वभावजम ||’

शौर्य, तेज, युद्ध में स्थिर रहना ….दान क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं |

‘कृषि गौरक्ष वाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम |

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम ||’

कृषि, गोपालन, वाणिज्य और व्यापार वैश्यों के स्वाभाविक कर्म हैं और शूद्र का स्वाभाविक कर्म सेवा है |

( वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था नहीं समझा जाना चाहिए | )

रामचरितमानस और गीता दोनों से हमें इस बात की जानकारी मिली कि पृथक पृथक कर्मो के संपादन हेतु चार प्रकार के वर्णो की व्यवस्था की गयी थी |

ये तो हुई वर्णो की बात |

अब जानते हैं की वर्णसंकर क्या है ??

महाभारत के अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म विस्तार से  ‘वर्णसंकर’ संतानों के बारे में युद्धिष्ठिर से चर्चा करते हुए कहते हैं कि जब एक वर्ण की स्त्री दूसरे वर्ण के पुरुष के साथ ज्ञानवश या अज्ञानवश सम्बन्ध स्थापित कर लेती है तो वर्णसंकर संतानों की उत्त्पत्ति होती है | यहाँ वे ब्राह्मण + शूद्र , शूद्र + क्षत्रिय , वैश्य + ब्राह्मण, शूद्र + ब्राह्मणी, वैश्य + क्षत्रिय ,शूद्र + वैश्य आदि समागम की चर्चा करते हुए इनके क्या क्या कार्यक्षेत्र हैं इसकी भी चर्चा करते हैं |

गीता के पहले अध्याय में कहा गया है

‘ अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः |

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ||

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |

पतन्ति पितरो ह्वेषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया ||’

‘ दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः |

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||’

इन  श्लोकों के माध्यम से कहा गया है कि वर्णसंकरों द्वारा व्यभिचार में वृद्धि होती है, मानव जाति पर युद्ध और महामारी का संकट आता है, पारिवारिक परंपरा का विनाश होता है, शास्त्रीय सम्मत नियमों का नाश होता है, सनातन-धर्म परंपरा के विखंडन से समाज में अव्यवस्था का फैलाव होता है |

गीता के इन श्लोकों ने मानों वर्तमान परिस्थिति का ही सजीव चित्रण किया है |

इसी को रामचरितमानस अपने शब्दों में कहता है –

‘बरन धरम नहीं आश्रम चारी |

स्त्रुति बिरोध बस सब नर नारी ||’

निंदास्पद मनोवृत्तियों में बढ़ोतरी की बात करता है मानस |

अब ज्योतिष के अनुसार बनने वाले योग के अनुसार ‘ वर्णसंकरों ‘ का नाश होगा से क्या तात्पर्य है, यह  समझ में आने लगा है |

कहने का तात्पर्य यह कि युग परिवर्तन होने वाला है | युग परिवर्तन से तात्पर्य यह नहीं कि कलयुग समाप्त होकर सतयुग प्रारम्भ हो जायेगा| प्रलय नहीं होने वाला है| कलयुग तो अभी चलेगा |

कल्कि भगवान के अवतरण में तो अभी समय है |

जब भगवान के आने में समय है तो फिर क्या संकेत है  ??

भगवान कल्कि के आने में तो अभी समय है लेकिन निश्चित ही भगवान ने मानव कल्याण हेतु एक टास्क फोर्स का गठन कर धरती पर  भेजने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है जिनका कार्य कलयुग के उच्श्रृंखल और  उन्मादित गति पर  लगाम लगाने की होगी |

तमोगुण का विनाश और सत्वगुण का प्रभाव बढ़ेगा |

धर्म की रक्षा होगी |

पारिवारिक परंपरा और संस्कारों में वृद्धि होगी |

ग्रह के द्वारा अनुग्रह की योजना है |

अर्थात हम कह सकते हैं कि विश्व इतिहास के अध्याय में एक नए अध्याय के लिखे जाने की शुरुआत होगी |

ज्योतिष कभी भी एकांगी होकर वस्तुओं को देखने की सलाह नहीं देता | समग्रता और सम्पूर्णता में आकलन करके ही फलाफल कथन की सलाह देता है |सवाल तो ज्योतिष ने किया लेकिन जवाब मानस और महाभारत से मिला |

@ B Krishna

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