रामदूत हनुमान

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अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम |

सकलगुणनिधानं वनराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||

अतुलित बल के धाम, दैत्यों के बन के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, रघुपति के प्रिय दूत और भक्त वायुनंदन कपीश श्री हनुमान जी को मेरा प्रणाम |

जब हम किसी भी वस्तु, पदार्थ या परम शांति की खोज में या अनुसन्धान में निकलते हैं तो हमारे मार्ग में तीन तरह की बाधाएं आती हैं |जब हम कुछ  खोजने निकलते हैं, खोज यात्रा शुरू करते हैं तब हम अति उत्साह में उछलते हुए चलते हैं |खुद पर इतना ज्यादा भरोसा होता है की लगता है कि हम सब कुछ कर पाने में सक्षम हैं | और जब इसी  भरोसे के बल पर हम उछलना और छलकना शुरू करते हैं तो विघ्न आना शुरू हो जाता है | हर किसी को इन विघ्नों के बारे में जानने की जरूरत है |

  तीन प्रकार के विघ्न आते हैं |

कौन कौन से हैं वह विघ्न और किस प्रकार उन विघ्नों से छुटकारा मिले यह आज हम सब जानेंगे हनुमान जी से |

जैसे तीन प्रकार की प्रकृति है वैसे ही तीन प्रकार की विघ्न (माया) है – सात्विक, राजसी और तामसिक | ये तीनो विघ्न बनकर आती हैं |इन विघ्नों से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ये यह देखने आती हैं कि जिस खोज में हम निकले हैं उसे खोज पाने की पात्रता हममे है की नहीं |

तो आइये हनुमान जी के पास चलें और उनसे ही जाने इन मायाओं के बारे में जो की खोज मार्ग में विघ्न उत्पन्न करती हैं | और फिर इसका निवारण कैसे हो यह भी जानेंगे |

1 – सात्विक माया ( सात्विक विघ्न- क्योंकि सुरसा ने देवों  के द्वारा आहार दिए जाने की बात कही )|

” सुरसा नाम अहिन्ह कै माता | पठइन्हि आई कही तेहिं बाता ||

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा | सुनत वचन कह पवनकुमारा || “

सीता माँ की खोज के लिए जब हनुमान जी निकलते हैं तो पहली बाधा,सापों की माता सुरसा के रूप में उनके सामने आती है | यह आई तो है हनुमान जी की परीक्षा लेने लेकिन एक चूक हो गयी इससे | वह क्या ??

इसने कहा कि  आज देवताओं ने इसके लिए आहार भेजा है | ऐसा कहकर उसने अपने आज्ञाकारिणी होने का एक सूत्र पकड़ा दिया हनुमान जी को |

फिर आगे जब दोनों के बीच की वार्ता आगे बढ़ती है और हनुमान जी कहते हैं कि अरी मैया मुझे अभी जाने दे |राम जी का काम करके मैं जब लौटूंगा तब तू मुझे अपना आहार बना लेना |मैं सत्य कहता हूँ और शपथ पूर्वक कहता हूँ |सत्य और शपथ -एक सूत्र पकड़ाते हैं यहाँ |

शपथ के पहले सत्य | यह नहीं कि अभी कुछ शपथ ले लिया बाद में जो होगा देखा जायेगा | ऐसा नहीं करना है |

उनके द्वारा ऐसा कहने के बाद भी जब सुरसा उन्हें जाने नहीं देती है तब हनुमान जी बुद्धि का प्रयोग करते हुए कहते हैं – ‘ ग्रससि न मोहि ‘ – बड़ी ही चतुराई से, बुद्धि से शब्दों का चयन करते हैं | अगर वे कहते ‘ ग्रससि मोहे ‘ , मुझे खा ले तो सुरसा उन्हें तुरंत खा जाती लेकिन उन्होंने ‘ न ‘ लगाया | मतलब मुझे क्यों नहीं खा लेती ?? माने तू मुझे नहीं खा सकेगी |

तीसरा सूत्र पकड़ाया हनुमान जी ने | विघ्न आये तब भी अपनी  बुद्धि को भ्रमित नहीं होने देना है |सतर्कता नहीं खोनी है |

‘ जोजन भरी तेहिं बदनु पसारा |कपि तनु कीन्ह दुगुन विस्तारा ||

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ | तुरत पवनसुत बत्तीस भयऊ ||

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा | तासु दून कपि रूप दिखावा ||

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा | अति लघुरूप पवनसुत लीन्हा ||

बदन पइठि पुनि बहार आवा | मागा बिदा ताहि सिरु नवा ||

सुरसा ने अपनी एक दैवी सिद्धि प्रकट की |एक योजन का विस्तार  किया  | तो हनुमान जी ने उससे दुगुना अपना शरीर कर दिया |इसके बाद उसने तुरंत सोलह योजन का मुंह फैलाया |हनुमान जी ने नियम का पालन किया | सोलह योजन से दुगुना अपना विस्तार किया | सुरसा ने जितना जितना शरीर बढ़ाया हनुमान जी उससे दुगुणाकर बढ़ाते चले गए |लघिमा सिद्धि दिखाई यहाँ हनुमान जी ने |

नियमबद्ध तरीका अपनाया | नियनबद्ध तरीका हम कब अपना सकते है जब हम सात्विक हों |

लेकिन जैसे ही सुरसा ने सौ योजन का मुंह बनाया वैसे ही अणिमा सिद्धि दिखते हुए तुरंत लघु आकर लेकर हनुमान जी मुंह से बाहर निकल आये |

फिर से एक सूत्र पकड़ाते हैं हमेंहर समय एक ही टेक्निक का प्रयोग नहीं किया जाता | समयानुरूप और परिस्थितिअनुरूप बगैर विवेक खोये हमें अपने टेक्निक में बदलाव लाना चाहिए |

और जब इस प्रकार से हमारी तयारी होती हैं तो कोई भी विघ्न आये उसे जाना ही पड़ेगा |

बुद्धि ,विवेक,और संयम के आगे विघ्न भी नतमस्तक हो जाएगी  | विघ्न भी आशीर्वाद देकर जाएगी जैसे की सुरसा ने हनुमान जी को दिया |

तो हनुमान जी ने हमें क्या सीख दी ??

योगबल ( शरीर को घटा बढ़ा लेने की क्षमता ), बुद्धि बल ( जब सुरसा अपना आकार बढाती जा रही थी तब इन्होने अपना आकार छोटा किया और फौरन मुंह से बाहर आ गए )| विवेक बल ( एक क्षण को भी विचलित नहीं हुए )|

ये बल जब हमारे पास होते हैं और हम उसका सही प्रयोग करना जानते हैं तो चाहे कितनी भी बाधाएं आएं हमारी जीत निश्चित है |

आज हम सभी ने सात्विक विघ्न को जाना |

आगे हमलोग क्रम से तमोगुणी बाधा और राजसिक बाधा के बारे में हनुमान जी से जानेंगे |

आइये हनुमान जन्मोत्सव के इस पावन अवसर पर हनुमान जी की चरणों में बारम्बार प्रणाम करते हुए लक्ष्य सिद्धि हेतु प्रयासरत हो जाएँ |

और हमारे प्रयास की वेग वैसी हो जैसे –

जैहौं रामबाण की नाइ

“लाल देह लाली लसै अरु धरी लाल लंगूर |

वज्र देह दानव दलन | जय जय जय कपि शूर || “

@ B Krishna