संतान जन्म (मन्त्रात्मक वर्णन )

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                     (ज्योतिष, विज्ञान और रामचरितमानस से )

रामचरितमानस में जीवन के प्रति जो व्यापक दृष्टिकोण है वह सारी मानव जाति के लिए उपयोगी है |अगर कहें कि यह हमारे देश और संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रन्थ है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |ज्योतिष भी तो यही है | मानस और ज्योतिष दोनों मानव के परिवर्तन से रूपांतरण की बात करते हैं |

ज्योतिष के साथ ऊर्जा की खोज में आज चलते हैं रामचरितमानस के पास |मैंने    बहुत पहले अपने एक ज्योतिषीय आलेख के माध्यम से जो कहा था, आज फिर कहती हूँ-  |

ज्योतिष सिर्फ भविष्यफल कथन ही नहीं है बल्कि व्यवहारशास्त्र और लोकशास्त्र भी है |

 आज से हमलोग धीरे धीरे  रामचरितमानस के माध्यम से इसे जानने का प्रयास करेंगे |

आज रामजन्म या कहें तो राम के प्रागट्य का दिवस है इसलिए शुरुआत संतान जन्म से | आज हमलोग, संतान जन्म की संभावनाओं को लेकर, ज्योतिष और विज्ञान क्या कहता है, इसे जानने के साथ-साथ रामचरितमानस क्या कहता है -यह भी जानेंगे |

 स्त्रियों के मासिक चक्र में चन्द्रमा की अहम् भूमिका है | ज्योतिष तो इसकी चर्चा करता ही है | एक शुभ संकेत यह है कि ज्योतिष के इस बात का समर्थन विज्ञान भी करता है |

आइये पहले जाने ज्योतिष क्या कहता है ??

प्रख्यात ज्योतिषी वराहमिहिर के अनुसार –

कुजेंदुहेतु प्रतिमासार्थवं

कुज – मंगल, इंदु – चंद्र  

चंद्र,  मंगल  के प्रभाव की वजह से स्त्रियों में प्रतिमास ऋतुप्रवाह संभव हो पाता है |

अब देखें विज्ञान क्या कहता है –

2001 के,अमेरिकन सेसिल बुक ऑफ़ मेडिसिन, संस्करण के अनुसार –

“Signals, for a rhythm with a periodicity longer than 24 hours, i.e. an infradian rhythm, include the gravitational influence of the MOON, which gives rise to the menstural cycle.”

सेसिल बुक ऑफ़ मेडिसिन भी स्त्रिओं में मासिक धर्म हेतु चन्द्रमा की मुख्य भूमिका को स्वीकारता है |

संतान जन्म का ऋतुचक्र से सीधा सम्बन्ध है |

रामचरितमानस

” एक बार भूपति मन माहीं | भै ग्लानि मोरे सुत नाहीं ||

गुर गृह गयेउ तुरत महिपाला | चरन लागि करि विनय विशाला ||

निज दुःख सुख सब गुरहि सुनायउ | कही बशिष्ठ  बहु विधि समझायउ ||

धरहु धीर होइहहि सुत चारी | त्रिभुवन बिदित भगत भयहारी ||

सृंगी रिषिहिं बशिष्ठ बोलावा | पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ||

राजगुरु बशिष्ठ, जिनके लिए कोई भी काम असाध्य नहीं था, पुत्रकामेष्टि यज्ञ के लिए सृंगी ऋषि को बुलाते हैं |

ऐसा क्यों ??

चंद्र के दोनों उन्नत सिरे  को ‘श्रृंग’ कहते हैं | अर्थात यहाँ सीधा सीधा संकेत चन्द्रमा की तरफ है |

चन्द्रमा भी कैसा ?? 

 श्रृंग वाला |

यहाँ इसका मतलब यह कि पूर्णिमा और अमावस्या का चाँद न हो |

चाँद में श्रृंग शुक्ल चतुर्थी के बाद ही दिखना शुरू होता है | मतलब शुक्ल चतुर्थी के बाद का चाँद हो |

पूर्णिमा का चाँद मतलब सूर्य से 180ᵒ की दूरी में चंद्र – 1/7  एक्सिस – ऐसा चाँद न हो |

अमावस्या का चाँद मतलब सूर्य के साथ ही चन्द्रमा का होना -ऐसा चाँद भी न हो |

शुक्ल चतुर्थी का चाँद मतलब – चन्द्रमा की अंशात्मक दूरी सूर्य से 36ᵒ  से 48ᵒ के बीच न हो |

ऐसा चाँद स्त्री को गर्भ धारण करानेवाला होता है |

भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें | प्रगटे अगिनि चारु कर लीन्हे ||”

अगिनिमंगल

चंद्र,मंगल के साथ एक खास प्रकार से सम्बन्ध बनाता है गर्भधारण के लिए |

इस तरह हमने देखा कि वराहमिहिर और विज्ञान ने जिस बात की चर्चा स्त्रियों के मासिक धर्म और गर्भ धारण को लेकर की है उसकी चर्चा मानस ने हजारों वर्ष पूर्व कर दी है |

काल के इस खंड में शास्त्र के संरक्षण के साथ साथ शास्त्र के अनुसन्धान की भी आवश्यकता है |जब ज्योतिष, विज्ञान और रामचरितमानस तीनों एक ही बात करते हैं तो कितना ही अच्छा हो कि ये तीनों एक साथ मिलकर काम करें |

राम जनम की बधाई हो !!

” गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद |

हरषवंत सब जँह तँह नगर नारि नर बृंद || “

@ बी कृष्णा

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