मंगलभवन अमंगलहारी

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मंगलभवन अमंगलहारी

तुलसी के मानस में ‘मंगलभवन अमंगलहारी ‘ शब्द दो बार आते हैं –

1 – मंगलभवन अमंगलहारी | द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी ||

2 – मंगलभवन अमंगलहारी | उमा सहित जेहि जपत पुरारी ||

इसे पढ़कर एक प्रश्न जो स्वाभाविक ही मन में आता है कि क्या दशरथ के राम और उमा एवं पुरारी द्वारा आराधित राम भिन्न भिन्न हैं ??

दशरथ का राम देश काल की सीमाओं में आबद्ध है और त्रिपुरारी के राम देश काल की सीमाओं से परे हैं |

सर्वत्र व्याप्त  राम का संस्पर्श इन्द्रियों  वाले  मानस को तभी प्राप्त होता है,जब साधक दशरथ और कौशल्या के सामान होते हैं | दशरथ की शक्ति कौशल्या है | ठीक उसी प्रकार त्रिपुरारी की शक्ति उमा हैं | पिता द्वारा विश्वासरूपी बीज प्रदान किया जाता है और उस बीज को फलदायक वृक्ष रूप में विकसित करने का कार्य शक्ति स्वरूपा माँ के द्वारा संपन्न होता है |

लेकिन क्या आज यह स्थिति है ??

 ब्रह्म को साक्षात् प्रकट करने वाले दशरथ और निराकार को नराकार बनानेवाली शक्ति माँ कौशल्या हैं ?? इतनी सुचिता बची है ?? इन प्रश्नो का जवाब यह है कि हम आपस में एक दूसरे के प्रति विश्वास एवं श्रद्धा उत्पन्न करें | यही श्रद्धा और विश्वास हमें कल्याण मार्ग पर अग्रसर करेगा |यही श्रद्धा और विश्वास राम को प्रगट करेगा |राम जो कि ‘ बिधि-हरि-संभु नचावन हारे ‘ ब्रम्ह भी हैं और पृथ्वी का भार उतारनेवाले मानव भी हैं |

जौ जगदीश तौ अति भलौ ,जौ महिस बड़ भाग |

तुलसी चाहत जनम भरि राम चरण अनुराग ||’

राम का राज्य आदर्श एवं कल्याणकारी राज्य है,जहाँ

नहीं दरिद्र कोउ दुखी दीना | नहीं कोउ अबुध लच्छन हीना ||’

शिव द्वारा आराधित महेश्वर राम की अनुभूति समस्त अज्ञान एवं तज्जन्य दुःख का नाश करनेवाली है |

भगति करात बिनु जातां प्रयास |संसृति मूल अविद्या नासा ||’

जीव संश्लेषण का परित्याग करके विश्लेषण की सीमाओं में बद्ध होकर अपने स्वाभाविक आनंद से बंचित रहता है |राम द्वारा निर्धारित मार्ग सत्य,प्रेम और करुणा का मार्ग है |इस मार्ग पर चलकर जीव को विशुद्ध आत्मचेतना का संस्पर्श प्राप्त होता है और यह जीव जब राम के सम्मुख होता है तब उसके कोटि जन्मों के दुखों का नाश होता है और असीमित आनंद की प्राप्ति होती है |यही कारण है कि तुलसी के राम ब्रह्म भी हैं और मानव भी |मानव राम सुन्दर, सुजान, कृपानिधान, एवं अनाथ पर प्रीति करनेवाले हैं तथा ब्रह्म राम निर्वाणप्रद हैं |भरद्वाज मुनि के अनुसार राम का प्रिय निवास स्थान प्रेम परिपूर्ण अंतःकरण है |

जाहि चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सं सहज सनेहु |

बसहुँ निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ||

भाई भारत ने ऐसा  ही अंतःकरण प्राप्त किया था –

अर्थ धरम काम रुचि गति चहौं निरवान |

जनम जनम रति राम पद यह बरदानु आन ||

आइये ऐसे राम को अपने मन में अपने अंतःकरण में प्रगटायें |

संकट की इस बेला में राम के इस मन्त्र का जाप करें| इससे निश्चय ही कर्मजन्य पापफलों का क्षय होता है | बस श्रद्धा और विश्वास चाहिए |

1 –  दैहिक दैविक भौतिक तापा |

       राम राज नहीं काहुहि व्याधा ||

2 – श्रीरामं हनुमन्तं सुग्रीवं विभीषणम |

      अंगदं जाम्ब्वन्तं स्मृत्वा पापैः प्रमुच्च्यते ||

जोग, लगन, ग्रह, वार और तिथि अनुकूल होने ही वाले हैं | बस श्रद्धा और विश्वास बनाये रखें |

मंगल हो ! मंगल हो !! मंगल हो !!!

@ B Krishna

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