” सुनु भरत भावी प्रबल …”

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चैत्र नवरात्रि से ठीक पहले हम काल के उस उस मुहाने पर खड़े हैं जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक जैसा सोच रहा है|  काल के इस मुहाने पर युग परिवर्तन की प्रतीति हो रही है |परिवर्तन की इस घड़ी में भारतवर्ष की कैसी भूमिका ग्रहों ने तय किया है, इसकी चर्चा हम आज यहाँ करेंगे |

चर्चा को आगे बढ़ने से पहले त्रेता युग और द्वापर युग की कुछ बातों का जिक्र करना यहाँ बनता है | गुरु वशिष्ठ (त्रेता युग में), जिनके लिए कहा जाता था किइनके लिए कुछ भी असाध्य या असंभव नहीं था वे जब अयोध्या पर आयी विपत्ति को रोक नहीं पाए और भरत ने जब इसपर आश्चर्य जाहिर किया तब गुरु ने कहा – ” सुनु भरत भावी प्रबल…”

काल बदला |द्वापर आया |काल का प्रभाव, जीवन में प्रतिकूल प्रतीत होने वाले सत्यों का साक्षात्कार और जीवन सन्देश  इस काल के एक प्रसिद्ध पात्र,सुयोग्य शासक महाराज परीक्षित से भी किया जा सकता है |इन्हेंजब पता चला कियुग परिवर्तित होने वाला है,अनेक विकृतियों वाले कलयुग का प्रवेश होने वाला है तब उन्होंने काल चक्र की गति को रोकने का प्रयास किया |कलयुग ने इनसे अपनी हार स्वीकारते हुए अपने रहने हेतु कुछ जगह की मांग की |परीक्षित ने रहने के लिए जो स्थान दिया उनमे स्वर्ण भी था |स्वर्ण में स्थान देते हुए परीक्षित ने यह कल्पना भी नहीं की होगी की यही कलयुग इनके स्वर्ण मुकुट में वास लेकर इनके सर पर सवार हो जायेगा |कलयुग जब इनके सर पर सवार हुआ तो वे भी कलयुग की विकृतिओं से ग्रसित हो गए |

गुरु वशिष्ठ का कथन पुनः याद आया -” सुनु भरत भावी प्रबल …”

काल की इस अपरिहार्यता को परीक्षित अलग अलग पद्धतिओं से जीतने का प्रयास करते हैं| अंततः वे आध्यात्मिक प्रयासों द्वारा काल की अपरिहार्यता पर विजय प्राप्त करते हैं |

आज फिर निर्णय की घड़ी है |

भौतिक दृष्टि से भले ही आज हमने बहुत विकास कर ली हो पर आध्यात्मिक विकास पर अभी भी सवालिया निशान है | आज अमेरिका भले ही भौतिक विकास में सभी राष्ट्रों से आगे है परन्तु अपराध के आंकड़े उसकी मानसिक और चारित्रिक विकास पर प्रश्न खड़े करते है|कमोवेश यही स्थिति हर राष्ट्र की होती जा रही है |

आज निर्णय की इस घड़ी में फिर से परीक्षित की प्रतीक्षा है | क्या भारत बन सकता है वह परीक्षित जो किआध्यात्मिक प्रयासों द्वारा काल की इस अपरिहार्यता पर खुद भी विजय प्राप्त करेंऔर विश्व का भी मार्ग दर्शन करें??

आइये जाने ज्योतिष से –

24 मार्च को ब्रह्म योग में  प्रारम्भ होने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की कुंडली जिसमे चतुर्थ भाव पर चतुर्थेश की दृष्टि है,षष्ठेश छठे भाव में है, सप्तमेश सप्तम भाव में ही है,दशमेश उच्च का होकर सप्तम भाव से अपने घर को देख रहा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि दशम भाव पर गुरु की दृष्टि है |

इसके साथ भारतवर्ष की दशा को भी देखें | काल की गति पर बात हो रही है तो काल चक्र दशा की बात करते है जो कि अभी तुला में तुला की है |छठे भाव की दशा है |

गोचरीय ग्रहों को देखें तो अष्टमेश गुरु का गोचर अष्टम भाव में धनु राशि से हो रहा है | केतु भी साथ है |अभी गोचर में इसी गुरु की दृष्टि षष्ठेश शुक्र पर भी है और शुक्र की दृष्टि छठे भाव पर है |गुरु, शुक्र और केतु मिलकर एक चक्र पूरा कर रहे है |

छठा भाव – धारणा का भाव ,ज्ञानयोग का भाव

आठवां भाव – समाधि का भाव ,भक्तियोग का भाव

गुरु ( बृहस्पति ) – सूर्य की ऊर्जा को ब्रह्माण्ड में संचारित करता है

शुक्र – मृतसंजीवनी विद्या इसके पास है |

केतु – धर्मध्वज

भारत के लिए बहुत ही अनुकूल संकेत है |

हालाँकि कुछ नकारात्मक संकेत भी है जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुकी हूँ | आज यहाँ बात सकारात्मक और निर्णायक भूमिका तय करने वाले संकेत की हो रही है |

जब दशा, गोचर और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इन तीनों की कुंडली से सकारात्मक  संकेत मिल रहा है कि ज्ञान और भक्ति इन दोनों का सहारा लेकर भारत विश्व को अपने वचनो से प्रभावित करने वाला होगा |तो ऐसे समय में हम संकल्पित मन से इस मन्त्र का आश्रय लें और भारत को आध्यात्मिक विश्व गुरु बनाने में अपनी ईमानदार सहभागिता दर्ज कराएं |

“ॐ सह नाववतु |सह नौ भुनक्तु |सह वीर्य करवावहै |

तेजस्वि नावधीतमस्तु | माँ विद्विषावहै |”

ॐ शांतिः ! शांतिः  !! शांतिः !!!

हम राग द्वेष से मुक्त होकर साथ चलें !

सब प्रकार से बल प्राप्त करें !!

सब परस्पर स्नेह सूत्र में बंधकर विकास के पथ पर अग्रसर हों !!!

दृढ संकल्पित हों !!!!

सुनु भरत भावी प्रबल …”

@B Krishna Narayan

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