स्वस्थ रहना है तो स्वर को पहचाने ( भाग -1 )

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त्रेता युग में जो लड़ाई दो प्रदेशों के बीच रहा और द्वापर आते आते वही लड़ाई प्रदेश से निकल कर परिवार में प्रवेश कर गया ,वही लड़ाई कलयुग में परिवार से निकलकर व्यक्ति के भीतर ही प्रवेश पा चुका है | जहाँ त्रेता में अंधकार और प्रकाश को बड़ी सरलता से पृथक किया जा सकता है वहीँ द्वापर आते आते इसका पृथक्करण जटिल होता गया | अब कलयुग में  अंधकार और प्रकाश का पृथक्करण तो असंभव सा जान पड़ता है |त्रेता में सूर्यवंशी राम ने मार्ग दिखाया ,द्वापर में चंद्रवंशी कृष्ण ने राह की पहचान कराई |

कलयुग में कौन ??

जरूरत है आत्मावलोकन करने का | ठहरकर सिंहावलोकन करने का |स्वर को पहचानने का |स्वर को पहचानने का ही नहीं बल्कि स्वर को साधने का भी | अब स्वर साधना के रूप में सबके अपने अपने राम और अपने अपने कृष्ण हैं | इनका आसरा लेकर हम अपनी काया को निरोगी बना सकते हैं |

तो क्या है यह स्वर शास्त्र ?? आइये आज इसे जाने –

मनुष्य की नासिका में जो दो छिद्र हैं उनमे से एक छिद्र से वायु का प्रवेश और दूसरी छिद्र से वायु का निकास होता है | जब एक छिद्र से वायु का प्रवेश और निकास हो रहा होता है तब दूसरा छिद्र स्वतः ही बंद हो जाता है | वायु के इस आवन और निष्कासन की क्रिया स्वर क्रिया कहलाती है | हम जिसे सांस कहते हैं वही स्वर है |हर दिन सूरज के उगने के साथ साथ ही स्वर का उदय भी होता है जो हर ढाई ढाई घड़ी अर्थात एक एक घंटे में बदलता रहता है | एक स्वस्थ व्यक्ति एक मिनट में पंद्रह बार साँस लेता है अर्थात एक घंटे में  900 बार और 24 घंटे अर्थात एक दिन में 21600  बार साँस लेता है | इससे अधिक सांस लेना या इससे काम सांस लेना जब होता है तो यह रोग का लक्षण है |

कभी कभी दोनों छिद्रों से एक साथ सांसों का प्रवाह शुरू हो जाता है | दाहिनी नासिका से जब वायु का प्रवाह होता है तब इसे सूर्य स्वर या पिंगला नाड़ी स्वर कहते हैं | बायीं नासिका से जब वायु का प्रवाह होता है तब इसे चंद्र स्वर या इड़ा नाड़ी स्वर कहते हैं और जब दोनों नासिका से वायु का प्रवाह होता है तब इसे उभय स्वर या सुषुम्ना नाड़ी स्वर कहा जाता है |

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा आने ही वाला है |चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक सांसों के आवागमन अर्थात संचार की गति से पूरा  वर्ष कैसा बीतेगा इसका अनुमान लगा लिया जाता है |इन तीन दिनों में सूर्योदय के समय या कहें की बिछावन  छोड़ने के समय चंद्र स्वर , इड़ा नाड़ी का चलना अनुकूल वर्ष का द्योतक है |स्वर की गति में अनियमितता व्यक्ति के रोग ग्रस्त होना दर्शाता है |

यहाँ एक सवाल जो स्वतः ही मन में आता है कि हम जो सांस लेते हैं ,सूर्य स्वर या चंद्र स्वर के रूप में इसका प्रवाह शरीर के भीतर कहाँ तक होना चाहिए ??  इन साँसों के निकास कि प्रक्रिया क्या होनी चाहिए ??

शास्त्र कहता है कि साँसों का प्रवाह शरीर के केंद्र तक होना चाहिए | शरीर का केंद्र का मतलब दिमाग या ” ह्रदय नहीं बल्कि नाभि से है |

यथोर्णनाभि सृजते गृहवते

यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति

यथा सतः पुरुषातकेशलोमानि

यथाक्षरःसम्भवतीह विश्वम

इस मंत्र में मकड़ी के दृष्टान्त द्वारा माता के गर्भ नाल से शिशु का जुरना और क्रमिक विकास कि चर्चा कि गयी है | नाभि को केंद्र बताया गया है |हमारे और परमात्मा से जुड़ाव का पूरा चित्रण है यह औपनिषदीय मन्त्र |

सांसों का सहज प्रवाह नाभि तक होना चाहिए | चलते ,उठते ,बैठते हर वक़्त आपकी साँसे नाभि से चले |अगर अभी आप अपनी सांसों पर गौर करें तो पाएंगे कि इसका प्रवाह सीने तक ही है और सीने से ही है |

 आपको पहला काम क्या करना है ??

श्वास को नाभि से चलाना है |

इसके बाद क्या करना होगा ??

सांसों को उलीचना है | सांस जब छोड़ा जाये तो पूरे वेग से छोड़ना है |कहा जाता है को कोई छह हज़ार छिद्र हैं हमारे श्वसन यन्त्र में |हम ज्यादा से ज्यादा एक से डेढ़ हज़ार छिद्रों तक सांस ले पाते हैं | बाकि छिद्र कार्बन -डाई-ऑक्साइड से ही भरे रहते हैं | हम उन्हें खली ही नहीं करते |

तो देखा आपने जितना साँस लेना जरूरी है उतना ही उलीचना भी जरूरी है |

अब तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात –

साँस को लेने और उलीचने के क्रम में केंद्र नाभि है यह हमेशा याद रखें |

प्राणायाम बिना गुरु के घातक हो सकता है क्योंकि उसमे एक व्यवस्था है ,अनुशासन है | लेकिन नाभि को केंद्र बनाकर सांसों का आवागमन को जो साधना है इसमें किसी गुरु को दरकार नहीं  |

अगर आपने ऊपर वर्णित इन तीन सूत्रों को समझ लिया ,सांसों को नैसर्गिक व्यवस्था को पा लिया तो आपने आरोग्यता का मूल मन्त्र पा लिया | फिर चाहे कैसी भी बीमारी हो आप देखेंगे को आप उससे प्रभावित नहीं होंगे और न ही आप मानसिक अवसाद से घिरेंगे और न ही आपको क्रोध आएगा |

तो आइये हम सब साथ मिलकर प्राणसाधना करें | परम के साथ लय स्थापित करें |अपनी अपनी सांसों को जाने | कलयुग में अपना अपना राम और अपना अपना कृष्ण पाएं |शरीर के भीतर गहरे पैठे अंधकार से मुक्ति पाएं |अपनी लड़ाई खुद ही लड़ें | तम पर विजय पाएं | स्वस्थ रहे और परम आनंद में रहे |

@B Krishna Narayan

ASTRO TALK

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