महाशिवरात्रि और जीवन सूत्र

 

महाशिवरात्रि की रात जागने का है नियम (फोटो साभार-सोशल मीडिया)

 

कर्पूर गौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेंद्रहारम

सदा बसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि ||

कपूर की तरह गौर वर्ण , करुणा के अवतार ,सर्पों को गले का आभूषण बनाने वाले  सर्वव्यापी शिव की आराधना का दिन है महा शिवरात्रि |

हिन्दू के कम ही ऐसे त्यौहार हैं जो कृष्णपक्ष में मनाये जाते हो | महा शिवरात्रि ,चंद उन्ही त्योहारों में से एक है |कृष्णपक्ष और रात्रि की प्रधानता है | ऐसा क्यों ?? कृष्णपक्ष में देव पूजन ?? लीक से हटकर नजर आता है | लेकिन जरा नजदीक जाकर देखेंगे तो जानेंगे को शिव कौन से लीक पर चलनेवाले देव हैं | भूत, ,भभूत ,दिगंबर ,मृगछाल , सर्प आदि तो इनके आभूषण हैं और गण हैं | और रही बात रात्रि को तो स्वयं चांद  ही इनके ललाट पर सुशोभित है |

वैसे तो शिवरात्रि हर माह में आता है लेकिन फाल्गुन माह के कृष्णपक्ष को शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहा जाता है | एक ऋतु का समापन और दूसरे ऋतु के आने की  आहट सुनाई देने लगती है | कह सकते हैं की यह दो ऋतुओं का संधिकाल होता है | शीत ऋतु को कंपकपाने वाली ठंढ और ग्रीष्म ऋतु का ताप ,ऋतु परिवर्तन के इस प्रक्रिया से शरीर प्रभावित न हो, इसी से खुद को बचाने के  संतुलित और संकल्पित तप वाली प्रक्रिया की शुरुआत का दिन है यह | | ज्योतिषीय रूप से भी अभी देखें तो बुध ,शुक्र से दूर जा रहा है और मंगल ,केतु के नजदीक आ रहा है | यह योग वर्षा और ठण्ड की सम्भावना को क्षीण कर रहे हैं और गर्मी को बढ़ा रहे हैं |

महा शिवरात्रि को लेकर कई पौराणिक कथाएं हैं | एक तो यह को इस दिन शिव और पार्वती परिणय सूत्र में बंधे थे | वैरागी शिव , गृहस्थ शिव बने थे |वैरागी का गृहस्थ में बदलना हुआ था | परिवर्तन से रूपांतरण का समय है महाशिवरात्रि |

देश के कुछ हिस्से में यह कथा प्रचलित है कि अमृत मंथन से निकले विष को शिव ने इसी रात को  पिया था | विष ,पेट में न चला जाये इसलिए पार्वती ने शिव का गला जोर से पकड़ लिया ,और शिव विष का वमन बाहर न कर  दें इसलिए देवताओं ने इनका महिमा गान शुरू कर दिया |अब इसी कशमकश  में रात्रि बीतने लगी |अंततः सुबह होते होते शिव ने विष को हमेशा के लिए अपने गले में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाये |इस रात्रि को रात भर जागने की प्रथा के पीछे यही मान्यता है | यहाँ हमें घर ,परिवार और समाज में सम्यक और संतुलित अवस्था में रहने का महत्वपूर्ण सूत्र पकड़ाते हैं  शिव |

एक अन्य कथा के अनुसार पहली बार इसी रात्रि को महादेव प्रगटे थे | निराकार से साकार हुए थे |निराकार से साकार रूप लेना यह तभी संभव है जब  बाह्य और अंतस में लयबद्धता हो | तो जैसे जैसे हम महाशिवरात्रि के माध्यम से शिव को समझ रहे हैं या यूँ कहें को शिव के माध्यम से महाशिवरात्रि को समझ रहे हैं ,हमें एक एक करके जीवन सूत्र पकड़ में आता जा रहा है |

एक अन्य कथा की अनुसार इस रात्रि को एक चोर ने चोरी करके भागते हुए बेल की पेड़ पर शरण लिया | रात भर वह बेलपत्र तोड़ता रहा जिनमे से कुछ बेल की पत्ते पेड़ की नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरते रहे |चोर के द्वारा  वगैर किसी अभिप्राय के किये गए इस कार्य ने भी शिव को प्रसन्न कर दिया | शिव यहाँ एक बार फिर हमें औढरदानी होने का सूत्र पकड़ाते हैं |

शिव कृपा और तपस्या इन दोनों के संयोग से ही असाध्य प्रारब्ध को साध्य बनाया जा सकता है | सिर्फ पुरुषार्थ से यह संभव नहीं है | इस दिन चौबीस घंटे निराहार रहना तप करने के शुरुआत है |तप में जब संकल्प जुड़ जाता है तो शरीर शास्त्र की सारी मान्यताएं झूठी पर जाती हैं |शरीर शास्त्र को दृष्टि से अगर देखा जाए तो अन्न,जल ,वायु के वगैर शरीर जीवित नहीं रह सकता लेकिन एक संकल्पित तपस्वी इन सारी मान्यताओं को झुठलाता हुआ ऊर्जा के एक नए आयाम से अपना सम्बन्ध स्थापित करता है  | आध्यात्मिक उत्थान का समय है यह | शक्ति के केंद्र से स्वयं को जोड़कर प्रारब्ध को बदलकर कर्मचक्र से मुक्त हो जाता है | काल चक्र को गति से बाहर निकलने का रास्ता दिखते हैं शिव |

कितनी आसानी से महाशिवरात्रि हमें जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (सम्यक जीवन,संतुलित जीवन,लयबद्ध जीवन, रूपांतरित जीवन, सहिष्णुता,समत्व, निष्कामता,औढरदानी ),तो पकड़ाता ही है ,हमारे लिए मुक्ति का द्वार भी खोलता है |

आईये सब मिल कर विश्वास के घनीभूत रूप शिव का ध्यान करें और साँसों को माला फेरते हुए जपें ..

“ॐ नमः शिवाय ” ,

“ॐ नमः शिवाय “,

“ॐ नमः शिवाय ”

@B Krishna Narayan

ASTRO TALK

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