‘समाधि ‘

          Image result for samadhi            

 

                                                            ‘समाधि 

जगत के विविध तापों  से छुटकारा दिलाने वाले अष्टांग योग की बृहत् चर्चा करता है ज्योतिषशास्त्र |ब्रह्म को प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी योग से ही सुलभ होता है |एकचित्त होना ,चित्त को एक जगह स्थापित करना योग है |चित्तवृतियों के निरोध को भी योग कहते हैं |जीवात्मा एवं परमात्मा में ही अंतःकरण की वृत्तियों को स्थापित करना ‘ योग ‘है |

अष्टांग योग में अब तक हमने यम ,नियम ,आसन ,प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा और ‘ध्यान’ के बारे में जाना | अब जानेंगे ‘ समाधि ‘के बारे में | समाधि कहने से अमूमन लोग यह समझते हैं की इहलीला की समाप्ति | शरीर का त्याग समझने लगते हैं | पर ऐसा नहीं होता है | तो क्या है ‘समाधि ‘ आइये इसे अष्टांग योग से जाने और इसके बाद हमलोग यह जानेंगे की ज्योतिष की इसमें क्या भूमिका है |

समाधि :-

शास्त्र कहता है ,”  जो चैतन्य रूप से युक्त और प्रशांत समुद्र की भांति स्थिर हो ,जिसमे आत्मा के सिवा अन्य किसी चीज की प्रतीति न होती हो ,उस ध्यान को ‘समाधि ‘ कहते हैं |जो ध्यान के समय अपने चित्त को ध्येय में लगाकर वायुहीन प्रदेश में अग्निशिखा की भांति अविचल एवं स्थिर भाव से बैठा रहता है वह ‘समाधिस्त ‘ कहा गया है |”

समाधि की अवस्था :- जो न सुनता है न सूंघता है ,न देखता है ,न रसास्वादन करता है ,न स्पर्श का अनुभव करता है ,न अभिमान करता है ,केवल काष्ठ की  भांति अविचल भाव से ध्यान में स्थिर रहता है ऐसे ईश्वरचिंतनपरायण व्यक्ति को ‘ समाधिस्थ ‘ कहते हैं |समाधिस्थ मनुष्य की स्थिति ठीक वैसी होनी चाहिए जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक कम्पित नहीं होता |नाना प्रकार  के विघ्न उपस्थित होने के बाद भी जो अविचल रहता है वह ही समाधिस्थ  होता है |उसपर भगवान की कृपा बरसती है |

इस प्रकार हमने एक एक करके अष्टांग योग को जाना | देह सब प्रकार के रोग और दुखों का आश्रय है |परन्तु योगयुक्त हो जाने से किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं रह जाता है |

जरूरी है की हम इन आठों योग का अभ्यास करें | सिर्फ तरह तरह के आसन द्वारा शरीर का तोड़ मरोड़ करना या भिन्न भिन्न प्राणायाम के द्वारा सांसो का तोड़ मरोड़ न करें बल्कि यम से शुरू करके नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा ध्यान और समाधि का एक दूसरे के साथ लय स्थापित करें | क्रमबद्ध रूप से सबके बीच एक सम्यक गति स्थापित करें | इस गति को स्थापित करने में सहायक है ज्योतिष | ज्योतिष के माध्यम से हम इन गतियों में ,इनकी लय में कहाँ गतिहीनता है या कहाँ लय टूटा है,जान सकते हैं | हिब्रू भाषा में Spirit का अर्थ होता है सांस ।इसे कब और कैसे spirituality,आध्यात्म् से जोड़ा गया खबर नहीं। हाँ ,हमारी सांसें आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होने में एक पायदान जरूर है।आध्यात्मिकता को पूर्ण रुप में समझने में ज्योतिषशास्त्र हमारी दिशा निर्देश करता है ,कुंडली का चतुर्थ भाव (प्राणायाम,) ,पंचम् भाव ( प्रत्याहार),छठा भाव ( धारणा),सप्तम् भाव (ध्यान) एवं अष्टम् भाव समाधि,deep focus ) के बीच तारतम्य बैठाकर नवम् भाव (गुरु) के आशीर्वाद से किए गए कर्मों (दशम भाव ) द्वारा तथा सूर्य (आत्मा) ,चंद्र (मन),बुध (बुद्धि) के बीच सम्यक् योगों के योगदान से। जैसे बत्ती ,तेल और तैल पात्र इन तीनो के संयोग से ही दीपक की स्थिति है इनमे से एक के आभाव में दीपक नहीं रह सकता उसी प्रकार योग और ज्योतिष है |ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं |इन दोनों का सम्यक समावेश हो जाए तो शरीर रोगमुक्त ,क्लेशमुक्त हो जाए |

जैसे मलिन दर्पण शरीर का प्रतिविम्ब ग्रहण करने में असमर्थ होने के कारण शरीर का सही ज्ञान कराने की क्षमता नहीं रखता उसीप्रकार  सम्यक योग के बिना सिर्फ आसन या प्राणायाम करके परमात्मा के सही स्वरुप को नहीं जाना जा सकता | उसके लिए जरूरो है सर्वांग शुद्धि की | इसलिए जरूरी है की योग को जानने के लिए ज्योतिष द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को जाने |क्योंकि ज्योतिष हमेशा योग की ही बात करता है |कुंडली के लग्न भाव से अष्टम भाव की यात्रा करने में सहायक होता है नवम भाव |  यहाँ एक ध्यान देने वाली बात यह की हमें हमेशा उर्घ्वमुखी कैसे हुआ जाए यही सिखाया जाता है | सतत आगे आगे और आगे जाने की शिक्षा दी जाती है | लेकिन ज्योतिष हमें सम्पूर्णता की पाठ पढ़ाता है |उर्घ्वमुखी के साथ साथ अधोमुखी होना भी सिखाता है | गुरु ( नवम भाव ) ,अष्टम भाव से मिलता है ,अधोमुखी होता है फिर हाथ पकड़कर  दशम भाव ( कर्म भाव ) ,एकादश भाव ( आय भाव ) और द्वादश भाव ( व्यय भाव , मोक्ष भाव ) की ओर ले जाता है | पहले अपसव्य फिर सव्य होता है गुरु | जीवन का सार समझाता है गुरु इन योग के माध्यम से | गुरु ,नवम् भाव कहते हैं उत्तरोत्तर बढ़ते जाना विकास होता है पर -गुरू,पीछे लौटता है ,अष्टम भाव में

और,द्विज का जनक बनता है एक अनगढ़ ,अबोध को बोधमय बनाता है | तो गुरु की प्राप्ति कब जब हम योग के माध्यम से सात्विक होए और शुचिता लाएं |

योगस्थ होकर सूक्ष्म तरंगो का  संचार जाना जा सकता है |परिवर्तन से रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है | यह हमें, भौतिक स्तर पर परिवर्तित करता हुआ आध्यात्मिक रूपान्तरण की ओर ले जाता है ।| योग सिखाता है हमें शून्य होने की कला |शून्य होना ..बाहर से नहीं बल्कि भीतर से ,बाहर की शून्यता मौत है, भीतरी शून्यता जीवन |

तो आइये योगमुक्त हों |योगस्थ हों |रोगमुक्त हों | विकार मुक्त हों | प्रकाशवान हों | परम से जुड़ जाएँ | परममय हो जाएँ |

 

@ B Krishna Narayan

YouTube Channel :- ASTRO TALK

www.lightonastrology.com