‘धारणा’ और ‘ध्यान’

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 ‘धारणाऔरध्यान’

जगत के विविध तापों  से छुटकारा दिलाने वाले अष्टांग योग की बृहत् चर्चा करता है ज्योतिषशास्त्र |ब्रह्म को प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी ‘ योग ‘से ही सुलभ होता है |एकचित्त होना ,चित्त को एक जगह स्थापित करना योग है |चित्तवृतियों के निरोध को भी योग कहते हैं |जीवात्मा एवं परमात्मा में ही अंतःकरण की वृत्तियों को स्थापित करना ‘ योग ‘है |

अष्टांग योग में अब तक हमने यम ,नियम ,आसन ,प्राणायाम, प्रत्याहार  बारे में जाना | अब जानेंगे ‘धारणा’और ‘ध्यान’ के बारे में  |

धारणा

ध्येय वास्तु में जो मन की स्थिति होती है उसे धारणा कहते हैं |

देह के भीतर नियत समय तक जो मन को रोक कर रखा  जाता है और वह अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता यही अवस्था ‘ धारणा ‘ कहलाती है |बारह आयाम की ‘ धारणा ‘ होती है | जिस अंग में व्याधि की सम्भावना हो उस अंग को बुद्धि से व्याप्त करके तत्वों की धारणा करनी चाहिए |आग्नेयी ,वारुणी ,ऐशानि और अमृतात्मिका चार प्रकार की धारणा करनी चाहिए |

1 -आग्नेयी धारणा :- पैर के अंगूठे से लेकर माथे तक किरणों का समूह व्याप्त है और वह बड़ी तेजी के साथ इधर उधर फैलता है |साधक को तब तक इस रश्मिमंडल का चिंतन करते रहना चाहिए जबतक की वह अपने सम्पूर्ण शरीर को उसके भीतर भस्म होता न देखे |इसके द्वारा शीत और श्लेष्मा का उपचार किया जाता है |

2 -वारुणी धारणा :- स्थिर भाव से विचार करते हुए मस्तक और कंठ के अधोमुख होने का चिंतन करें |साधक अपने अंतःकरण द्वारा ध्यान में लग जाए और ऐसी धारणा करे कि जल के अनंत कण प्रकट होकर एक दूसरे से मिलकर हिमराशि को उत्पन्न करते हैं और उससे इस पृथ्वी पर जल कि धाराएं प्रवाहित होकर सम्पूर्ण धरा को जल से आप्लावित कर रहे हैं |इस प्रकार उस शीतल अमृत स्वरुप जल के द्वारा ब्रह्मरंध्र से लेकर मूलाधार पर्यन्त सम्पूर्ण चक्रमण्डल को आप्लावित करके सुषुम्ना नाड़ी के भीतर होकर पूर्ण चंद्र मंडल का चिंतन करें |आलस्य छोड़कर साथ में विष्णु मंत्र का जप करें

3 -ऐशानि धारणा :- प्राण और अपान का क्षय होने पर ह्रदय आकाश में कमल के ऊपर विराजमान भगवान विष्णु के अनुग्रह का चिंतन करें |यह चिंतन तब तक करें जब तक कि सारी चिंता का नाश न हो जाए |उस परम तत्व  का साक्षात्कार हो जाने पर ब्रह्मा से लेकर यह सारा चराचर जगत ,ध्याता ,ध्यान और ध्येय सबकुछ हृदय कमल में लीन हो जाता है |

4 -अमृतमयी धारणा :- मस्तक कि नाड़ी के केंद्र स्थान में पूर्ण चन्द्रमा के समान आकारवाले कमल का ध्यान करें |यह भावना करें कि आकाश में दस हज़ार चन्द्रमा के समान प्रकाशमान एक पूर्ण चन्द्रमण्डल उदित हुआ है जो कल्याणमय रश्मियों से परिपूर्ण है |ऐसा ही ध्यान अपने ह्रदय कमल में भी करें और उसके मध्य भाग में अपने शरीर को स्थित देखें | इससे साधक के सभी क्लेश दूर हो जाते हैं |

ध्यान

स्थिर चित्त से भगवान का बारम्बार चिंतन करना ‘ ध्यान ‘ कहलाता है |समस्त उपधियों से मुक्त मन सहित आत्मा का ब्रह्म विचार में परायण होना भी ‘ ध्यान’ ही है |मनुष्य को चाहिए कि वह ध्याता ,ध्येय तथा ध्यान का ज्ञान प्राप्त करके योग का अभ्यास शुरू करे |योग से मोक्ष तथा आठ प्रकार कि सिद्धिओं कि प्राप्ति होती है |जो ज्ञान ,वैराग्य से संपन्न ,क्षमाशील तथा हमेशा उत्साह रखनेवाला हो ऐसा मनुष्य  ही ‘ ध्येता ‘ कहलाता है |व्यक्त और अव्यक्त सभी को परमात्मा का स्वरुप समझकर चिंतन करना ‘ध्यान ‘कहलाता है |परमेश्वर ही ध्येय हैं |ध्यान यज्ञ श्रेष्ठ और सभी दोषों से रहित है |ध्यान अंतःकरण कि शुद्धि का प्रमुख साधन और चित्त को वश में करनेवाला है |पहले विकारयुक्त ,अव्यक्त तथा भोग्य भोग से युक्त तीनो गुणों का क्रमशः अपने ह्रदय में ध्यान करें |तमोगुण को रजोगुण से और रजोगुण को सत्वगुण से आच्छादित करें |ध्यान से थक जाने पर जप करें और जप से थक जाने पर ध्यान करें | यह क्रम जारी रखें  | इसकी वजह से व्याधि और ग्रह मनुष्य के पास नहीं फटकने पाते तथा विजयरूपी फल कि प्राप्ति होती है |

@  B Krishna Narayan

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