श्रद्धा और आस्था का महापर्व छठ

 

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महापर्व छठ

श्रद्धा और आस्था का महापर्व है छठ |आज नहाय खाय ,कल खरना ,परसों सँझिया अर्घ्य और उसके कल होके भोरका अर्घ्य और पारणा ,चार दिनों तक चलने वाला महापर्व है यह | सूर्य जब अपनी नीच राशि ,तुला राशि में गोचर कर रहा होता है तब यह पर्व मनाया जाता है |पहला अर्घ्य ,साँझ का अर्घ्य डूबते सूरज को देकर कुल के बुजुर्गों के प्रति अपना समर्पण भाव प्रकट किया जाता है | दूसरा अर्घ्य उगते सूरज को देकर वंश  वृद्धि की प्रार्थना की जाती है | श्रद्धा ,समर्पण ,दृढ संकल्प का पर्व है यह | तप है यह | आत्मा का परमात्मा से जुड़ाव सहज ही नहीं होता बल्कि उसका एक पूर्ण विधान होता है |आइये इस महापर्व के शुभ अवसर पर क्रम से एक एक करके इस विधान को जानने की प्रक्रिया से गुजरें :-

जगत के विविध तापों  से छुटकारा दिलाने वाले अष्टांग योग की बृहत् चर्चा करता है ज्योतिषशास्त्र |ब्रह्म को प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी ‘ योग ‘से ही सुलभ होता है |एकचित्त होना ,चित्त को एक जगह स्थापित करना योग है |चित्तवृतियों के निरोध को भी योग कहते हैं |जीवात्मा एवं परमात्मा में ही अंतःकरण की वृत्तियों को स्थापित करना ‘ योग ‘है | अष्टांग योग से आज हमलोग यम , बारे में ,पुराण क्या कहता  हैं ,उसे जानेंगे |इसके बाद एक एक  करके नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा,ध्यान और समाधि के बारे में क्रमवार तरीके  से जानेंगे

यम ( संयम ) :-

अहिंसा ,

सत्य ,

अस्तेय ,

ब्रह्मचर्य और

अपरिग्रह ,ये पांच यम हैं |

 

1 – अहिंसा – किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाना अहिंसा है |अहिंसा के दस भेद हैं |किसी को उद्वेग में डालना ,संताप देना ,रोगी बनाना ,शरीर से रक्त निकालना,चुगली करना ,किसी के हित में अत्यंत बाधा पहुँचाना ,उसके छुपे हुए रहस्यों को उद्घाटित करना , दूसरों को सुख से वंचित करना ,अकारण कैद करना और प्राणदंड देना |

2 – सत्य – जो बात दूसरे प्राणियों के लिए हितकर है वह ‘सत्य ‘है | ‘ सत्य ‘के लक्षण हैं – सत्य बोले किन्तु प्रिय बोले |अप्रिय सत्य कभी न बोले |

3 – ब्रह्मचर्य – मैथुन के त्याग को ‘ ब्रह्मचर्य ‘ कहते हैं | ‘ब्रह्मचर्य ‘ ही समस्त शुभ कर्मो की सिद्धि के मूल है |उसके बिना सारी क्रिया निष्फल हो जाती है |

4 – अस्तेय – मन ,वाणी और शरीर द्वारा चोरी से सर्वथा बचे रहना ‘ अस्तेय ‘कहलाता है |

5 – अपरिग्रह – शरीर को ढकने वाला वस्त्र ,शीत के कष्ट निवारण करने वाली कांथा, और खड़ाऊं,इतनी ही वस्तुएं अपने साथ रखें |इसके सिवा किसी अन्य वास्तु के संग्रह ही ‘ अपरिग्रह ‘ है |

@B Krishna Narayan

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