DEEPAWALI

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दिवाली
अंधकार से प्रकाश की ओर लेकर जाने वाला पर्व है दिवाली |दीपों का त्यौहार है दिवाली |कार्तिक माह के अमावस्या के दिन मनाया जाता है है यह |हर्ष और उल्लास के त्यौहार दिवाली के साथ बहुत सारी कथाएं जुड़ी हुई हैं | इसके पहले त्रयोदशी को धनतेरस और चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाया जाता है |

धनतेरस के दिन धन्वंतरि जो की आरोग्य के देव हैं उनकी आराधना की जाती है .लेकिन काल क्रम में इसका स्वरुप बदला और इसे सोने ,चांदी के खरीद से जोर दिया गया |यह धारणा बनाई गयी की इस दिन रत्न ,आभूषण खरीदना ऐश्वर्या को बढ़ने वाला होता है |एक पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात देवी लक्ष्मी और आरोग्य के देव धन्वंतरि का प्राकट्य हुआ था |

चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाया जाता है |यहाँ नरक का सम्बन्ध स्वर्ग नरक वाले नरक से नहीं है | श्री कृष्ण ने इस दिन नरकासुर नमक असुर ,राक्षस का वध किया था |नरकासुर के वध से लोगों में जो चैन और हर्ष की लहर दौड़ी,उसके उत्सव का समय है यह |यहाँ एक रोचक तथ्य यह है की इस समय पूरे देश में सिर्फ गुजरात प्रान्त में नववर्ष मनाया जाता है |यह श्री कृष्ण की प्रशासनिक भूमि गुजरात और श्री कृष्ण के सम्बन्ध की प्रगाढ़ता को दर्शाता है |

नरक चदुर्दशी वाले दिन देश के कई प्रांतों में आंटे का दीप बनाकर उसमे सात प्रकार का अनाज रखा जाता है और सरसों का तेल और रुई की बाती बनाकर डाली जाती है |इस दीए को जलाकर घर का कूड़ा जहाँ रखा जाता है वहां रखा जाता है |इसे यम का दीया कहा जाता है .कहते हैं यम से जीवन का आशीर्वाद माँगा जाता है . इसे रखने के बाद एक लोटा जल वहां अर्पण किया जाता है .फिर वापस मुड़ के उस दीये का दर्शन ,दीये को जलाकर रखने वाली महिला और घर का कोई भी सदस्य नहीं करता है |कहीं कहीं इसे सायं काल खाना पकाना शुरू करने से पहले जलाकर रखा जाता है और कहीं कहीं जब घर के सभी सदस्य खाना खाकर सोने चले जाते हैं तब घर की महिला दीया जलाकर कूड़ा स्थान पर रख आती है | इसे यम का दीया निकलना कहा जाता है |

लंका विजय के बाद श्री राम के घर वापसी का उत्सव है दीपोत्सव |हर्ष और उल्लास के साथ इसे पूरे देश में मनाया जाता है .
“विजयी विमान चढ़े आवत सुजान
आइ दूत हनुमान ऐसी खबर जनाई है।।”

दिवाली के दिन माँ लक्ष्मी और गणेश की पूजा की जाती है |ज्योतिष के अनुसार जब स्थिर लग्न और स्थिर नवांश के उदय हो रहा हो तब उस समय गणेश और लक्ष्मी के पूजन सर्वोत्तम फल देने वाला होता है . 27 अक्टूबर को मनाये जा रहे दिवाली के दिन सायंकाल 6:45 से रात्रि के 8 : 37 तक वृषभ लग्न ,स्थिर लग्न रहेगा और साढ़े सात से सात वयालीस तथा आठ पंद्रह से आठ तीस में स्थिर नवांश भी मिलेगा | यह समय पूजा के लिए उपयुक्त है |
इस त्यौहार की सार्थकता पटाखों से ही होती है |अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखों के छोड़े जाने पर प्रतिबन्ध लगाने के बाद दिवाली का उत्साह ख़त्म तो नहीं पर काम जरूर हो गया है |

महाराज रघुराज के आने की खबर आ गई है। नगर सज रहा है।
आइए हम सब मिलकर राम के स्वागत की तैयारी ,
“दधि दुर्वा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ।।“
दही ,दूर्वा ,रोचन ,फल ,फूल और तुलसी के साथ करें !!

@ B Krishna Narayan
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