Saptansh( D/7) +Astrology For Enrichment

   

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  सप्तांश के माध्यम से तत्व ज्ञान का बोध  कराता है ज्योतिष

जिस प्रकार कोई रत्न मिट्टी से सना होने के कारणअपने असली रूप मे प्रकट नहीं होता है ,उसी प्रकार अनंत जन्मों में किये हुए कर्मो के संस्कारों से मलिन हो जाने के कारण हमारी शक्ति प्रकट नहीं हो पाती.शक्ति का प्राकट्य हो इसके लिए ध्यान और साधना की जरूरत होती है .ध्यान योग का साधन करते करते जब पंच तत्वों पर  ,पंच महाभूतों पर साधक का अधिकार हो जाता है तो इन पंच महाभूतों से सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पंच सिद्धियां प्रकट हो जाती हैं ऐसे योगअग्निमय शरीर को प्राप्त कर लेने वाले उस योगी के शरीर में किसी तरह का कोई विकार नहीं होता है .शक्ति जब प्रकटती है तब उसकी  इच्छा के बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता . शक्ति साधना की विधि बताता है ज्योतिष .ज्योतिष में भिन्न  भिन्न वर्गों की चर्चा है .एक वर्ग है सप्तांश .आइये शक्ति आराधना करें सप्तांश से ..

बारह राशि = 360*

इसको  सात भागों में जब बाटेंगें (1/7*360 , 2/7*360 …..और तब जो राशि एवं अंक प्राप्त होंगे वे क्रम से हैं –

1 – वृषभ ( 21*25’)

2- कर्क  (12* 51’)

3 -कन्या (4*17’)

4- तुला  (25*42’)

5 – धनु ( 17*08’)

6 –कुम्भ ( 8* 34’)

7 – मेष( 00*00’) यहाँ 360 डिग्री का चक्र पूरा होता है. मीन का अंत और मेष की शुरुआत

(इन्हे बढ़ते क्रम से रखें तब जो राशिओं का क्रम आएगा वो क्रम रहेगा मेष ,कन्या .कुम्भ, कर्क ,धनु ,बृषभ ,तुला)

मेष = कन्या

कन्या = कुम्भ

कुम्भ = कर्क

कर्क = धनु

धनु = वृषभ

वृषभ = तुला

तुला = मीन या मेष ??

यहाँ हमें शारीरिक विकारों से मुक्त होने की दिशा में किये जा रहे साधना, उस साधना में आने वाली बाधाओं और उन बाधाओं से मुक्ति कैसे हो उसका संकेत इन राशियों के माध्यम से हमें मिलता है .मेष राशि बाधित है तो उपचार कन्या राशि से .अब यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह की मेष राशि का अपचार कन्या राशि से तो क्या कन्या राशि के बाधित होने का उपचार मेष राशि से ? ऐसा नहीं है .कन्या राशि का उपचार कुम्भ राशि के पास .कुम्भ का कर्क के पास ,कर्क का धनु के पास ,धनु का वृषभ के पास ,वृषभ का तुला के पास और तुला से मीन के पास ले जाकर यह हमें एक संकेत देकर छोड़ देता है की मीन या मेष ,मुक्ति या फिर से चक्रों में भ्रमण .प्रकृति अनायास ही कुछ प्रकट नहीं करती .यह संकेत देती है .इन संकेतों को पढ़ना शुरू किया है .प्रकृति के रहस्यों को उद्घाटित करने की दिशा में चलना शुरू किया है .यहाँ जो बात अपनी ओर ध्यान आकर्षित करता है वह यह की मेष से मीन तक की यात्रा कन्या से होते हुए ,उर्घ्वमुखी यात्रा है .भिन्न भिन्न राशियाँ आगे आगे और आगे ही गमन कर रही हैं .” अगर गति इति अग्नि ” अग्नि से मेल होता है यहाँ .शक्ति जागृत होती है यहाँ

 

इन सातों से मिलकर जो आकृति बनती है वो ये है ..

प्राचीन दक्षिण भारतीय मंदिरों में इसे देखा जा सकता है .यह नर और नारायण ,मनुष्य और ईश्वर ,शिव और शक्ति ,स्थूल और सूक्ष्म के बीच संतुलन के सही ध्यान स्थिति का प्रतीक है .संसार से निवृत्ति के लिए जरुरी है यह संतुलन .” संसरण इति संसारः ” जो धीरे धीरे सरकती जाये उसी का नाम संसार है . हर पल सरकती जानेवाले संसार और न सरकने वाली आत्मा के बीच का संतुलन ,प्रकृति और पुरुष के बीच का संतुलन ,शिव और शक्ति के बीच संतुलन का प्रतीक है यह आकृति .

ऊपर वर्णित सप्तविभाजन से हमें जो राशियाँ  मिली वे है मेष ,वृषभ , कर्क , कन्या , तुला ,धनु और कुम्भ .यहाँ ध्यान देने  योग्य बात यह है की ये सभी  वैसी राशियाँ हैं जहाँ ग्रह स्वराशि के होते हैं , मूल त्रिकोण राशि में होते हैं या उच्च राशि में होते हैं .शुक्र की दोनों राशियाँ है इसमें ,इसलिए यहाँ सबसे अधिक महत्ता वाला ग्रह शुक्र है और कर्क राशि चन्द्रमा की स्व राशि और वृषभ राशि चन्द्रमा की उच्च राशि होने के कारण चन्द्रमा की महत्ता भी शुक्र के सामान समझी जाये . ऊर्जा के संचार का पथ दर्शाती हैं ये राशियाँ .शुक्र और चन्द्रमा की विशेष महत्ता के पीछे का कारण क्या ? जवाब मिलता है भिन्न भिन्न ग्रंथों में वर्णित चक्रों  (मूलाधार ,स्वाधिष्ठान, मणिपूर,अनहत,विशुद्ध ,आज्ञा ,सहस्रार ) की व्याख्या से .उनके अनुसार शुक्र और चंद्र मानव मन को संवेदनशील बनाते हैं तथा मन की एकाग्रता में बाधा उत्त्पन्न करते हैं .परिणामतः कभी कभी इन चक्रों तक पहुंचकर साधक ,ग्रहों के प्रवल प्रभाव से असफल भी हो जाते हैं .उनकी साधना भंग हो जाती है . साधना भंग न हो इसके लिए हमें सप्तांश कुंडली में शुक्र और चंद्र के साथ साथ वृषभ ,तुला राशि और कर्क राशि का सही आकलन करना चाहिए .

आयुर्वेद में भी चक्रों के बाधित होने या सही  होने के आधार पर बहुत सारे बिमारियों का उपचार किया जाता है जिसमे की संतान के जन्म से सम्बंधित समस्याएं भी हैं .

ज्योतिष सिर्फ भविष्य कथन नहीं है बल्कि जीवन की गति उर्घ्वमुखी कैसे हो , अग्नि से मेल कैसे हो और शक्ति का प्राकट्य कैसे हो , शारीरिक विकारों से मुक्त कैसे हों ,सृजनशील  कैसे बने यह सब बताता है ज्योतिष .भ्रम में नहीं बल्कि भ्रम से मुक्त करता है ज्योतिष . जरूरत है इसके मूल को तलाशने का , पहचानने का ,पाने का ,आत्मसात करने का

ये तभी संभव है जब हम भृगु जैसे शिष्य बने और वरुण जैसे गुरु मिले .देवी से यही प्रार्थना की तत्वों को जानने की जिज्ञासा और बढ़ाएं और बढ़ाएं बढाती ही जाएं ” ज्वलः ज्वलः प्रज्ज्वलः प्रज्ज्वलः “.

” या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ”

@ B Krishna Narayan