Astrology+Understanding of Infinite Expansion Of Universe

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अनंत विस्तार की समझ है ज्योतिष
जीवन में आनंद का संचार होने लगता है जब प्रकृति की सृजन का सूत्र पकड़ में आता है .यह समझ में आता है की कैसे कभी कभी विलक्षण मेधा से परिचय कहीं से अलग होकर ही होता है .प्रत्येक अलगाव एक नए जुड़ाव का सूचक है . आपके न चाहते हुए भी प्रकृति आपको अगर कहीं से अलग कर रही है तो प्रकृति आपमें अनंत विस्तार की संभावनाओं की तरफ इशारा कर रही है .जरुरत है हर पल दिए जा रहे प्रकृति के सन्देश को पढ़ पाने की. मेधा को विकसित करने का . भीतरी शक्ति को पहचानने का .शक्ति आराधना ,शक्ति उपासना के इस परम वेला में शक्ति की खोज में मैं पहुंची हूँ तैतरीय उपनिषद् के पास .वहीँ से कुछ सूत्र आप सभी से साँझा कर रही हूँ…
गायत्री मंत्र का शुरुआती शब्द ‘ भूः ‘, भुवः ,स्वः .
आइये जाने इन शब्दों के पीछे छिपे रहस्य को तैत्तरीय उपनिषद से .
तैत्तरीय उपनिषद के पंचम अनुवाक में भूः ,भुवः स्वः के अलावा चौथी व्याहृति ‘ महः ‘ की भी चर्चा है ,जिसकी उपासना कैसे की जाये यह रहस्य सबसे पहले महचमस के पुत्र ने जाना था . तैत्तरीय उपनिषद के अनुसार ‘ भूः ‘ ,’भुवः ‘ ,और ‘स्वः ‘ के साथ ‘महः ‘के मिलने पर ही सर्वांग दर्शन किया जा सकता है . इन चारों का चार प्रकार से प्रयोग किया जाता है .
1- इन व्याहृतियों में लोक का चिंतन
‘भूः’ ,पृथ्वीलोक है .
‘भुवः’,अंतरिक्षलोक है .
‘स्वः’ स्वर्गलोक है
‘महः’ सूर्य है
मतलब भूः भुवः और स्वः तो स्थूलता की बात करते हैं और महः सूर्य की बात ,प्रकाश की बात ,अग्नि की बात ,सूक्ष्म रूप की बात करता है .सूर्य के रूप में आत्मा की बात करता है .सूर्य के रूप में वैसी अग्नि की बात करता है जो न घटती है न बढ़ती है .हमेशा समान तेज से सबको उपलब्ध होती है .

2- “भुरीति वा अग्निः .भुव इति वायु .सुवारित्यादित्यः .महः इति चन्द्रमाः .चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्तोतिषी महीयन्ते .भुरीति वा ऋचः .भुव इति सामानि . सुवरीती यजूँषि .महः इति ब्रम्ह .ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते .”
ज्योतियों में इनके द्वारा भगवान के उपासना का प्रकार बताया गया है .ज्योतिष शब्द की चर्चा है यहाँ,ज्योतियों के रूप में .यहाँ –
‘भूः’ एक नाम अग्नि का भी है तो भूः की चर्चा जब ज्योति के रूप में तब वहां यह अग्नि है .वाणी के अधिष्ठाता रूप में अग्नि की आराधना ,उपासना की जाती है .
‘भुवः’ यह वायु है .वायु ,इन्द्रिय के अधिष्ठाता देवता हैं .इन्द्रिय स्पर्श के .तो यहाँ ज्योतिविषयक उपासना में त्वचा को भुवः रूप में समझाया है .
‘स्वः ‘ सूर्य है .सूर्य चक्षु इन्द्रिय का अधिष्ठाता देवता है अतः ज्योति विषयक उपासना में सूर्य की सहायता से रूप को प्रकाशित करनेवाली ज्योति है .
‘महः, चन्द्रमा है .चन्द्रमा मन का अधिष्ठातृ देवता है .मन की सहायता से ही समस्त इन्द्रियां अपने अपने विषय को प्रकाशित कर सकती है अर्थात सभी ज्योतियों में सबसे अधिक महत्ता चन्द्रमा को दी गयी है . ज्योतिष को भविष्य कथन नहीं बल्कि ब्रह्म को पाने का माध्यम ज्योति रूप में ,अग्नि के रूप में बताया है .
3 – इसके बाद वेदों के विषय में इनकी चर्चा की गयी है और इनकी प्रयोग द्वारा ईश्वर के उपासना करने की विधि बतलाई है .
‘ भूः ‘ ऋग्वेद है
‘भुवः ‘ सामवेद है
‘स्वः ‘यजुर्वेद है
‘महः ‘ ब्रह्म है .
मतलब की सभी वेदों के ज्ञान का प्राकट्य ब्रह्म ज्ञान से हो सकता है .
4 – ” भुरुतिः वे प्राणः .भुवः इत्यापनः .सुवरीति व्यानः .महः इत्त्या अन्नम . अन्नेन वाव सर्वे प्राण महीयन्ते .”
प्राणो के विषय में इन चार व्याहृतियों की चर्चा है यहाँ .परमेश्वर उपासना में इनका कैसे उपयोग किया जाये यह बताया गया है .
‘भूः ‘ मतलब प्राण
‘भुवः ‘ अपान है
‘स्वः ‘ व्यान है
‘महः’ अन्न है
प्राण ,अपान और व्यान इन सभी प्राणो का पोषण अन्न के द्वारा ही की जाने के कारन महः की प्रधनता है .इसके माध्यम से अन्न को परमेश्वर रूप में दर्शाया गया है .
इस प्रकार हम देखते हैं की ‘भूः ‘,भुवः ‘ ,’स्वः ‘ और ‘महः ‘ इन चारों की पहले स्थूल रूप की चर्चा और ब्रह्म को जानने की प्रक्रिया और उपासना की विधि के बाद धीरे धीरे सूक्ष्म रूप की चर्चा इन्द्रिय और प्राण के रूप में .वेदों को जानकर ईश्वर की उपासना की विधि .इन सभी बातों को जो मनुष्य जान लेता है ,वह ब्रह्म को पा लेता है .
” या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ”

@B Krishna Narayan