Decoding Ramcharit Manas ( Part 2)

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ज्योतिष दो शब्दों से मिलकर बना है ,ज्योति+ईश .ज्योति मतलब प्रकाश ,अग्नि . ” अग्रे नयति इति अग्नि ” हमेशा उर्घ्वमुखी होता है यह . ऋग्वेद की शुरुआत अग्नि शब्द से हुई है ” अग्निं इले” .ज्योतिष शास्त्र के मूलभूत सिद्धांतो की विस्तृत चर्चा करता है ऋग्वेद .

दूसरा शब्द है ईश ,एक अर्थ  पौरुष भी .अर्थात जीवन और प्रकृति के रहस्यों को अपने पुरुषार्थ के द्वारा ( पहले से चली आ रहे सिद्धांतों को तब तक नहीं मानना जब तक की हम उसे खुद के परिश्रम से ,शोध से जांच न लें ),  उजागर करने की ऐसी विधा जो जीवन में हमेशा उर्घ्वगामी बनाये . प्रारब्ध और भविष्य के बीच का सेतु बने .यम, नियम ,आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार ,धारणा,ध्यान,समाधि के द्वारा अपने आपको साध के धर्म ,कर्म ,आय और व्यय करने की दृष्टि प्रदान करे .व्यय का एक अर्थ मुक्ति भी .व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक की इस यात्रा को अपनी पद्धति से गति देने की इस प्रक्रिया को फिर चाहे कला कहें या विज्ञान.. नियति तो ध्रुव है . नियति के अथाह  सागर से ज्योतिष के कुछ मोती चुनने की कोशिश ..

1 – विन्द मुहूर्त-  कहते है हर घटना के घटित होने का एक मुहूर्त पहले से निर्धारित होता है .एक मुहूर्त यानि अड़तालीस मिनट .भिन्न भिन्न प्रकार के मुहूर्त में एक मुहूर्त ‘ विन्द मुहूर्त ‘. रामायण में जटायु ने कहा – “येन याति मुहूर्तेन सीतामाताये रावणः

विप्रणष्टन धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्धते .

विन्दो नाम मुहूर्तोासौ न च काकुत्स्थ सोअबुधत ”

दिन में पंद्रह मुहूर्त होते हैं .इनमे बारहवां मुहूर्त विन्द मुहूर्त कहलाता है .इस मुहूर्त में अपहृत वस्तु ,खोयी वस्तु ,उसके मालिक को अवश्य प्राप्त होती है .

 

2 –”अवध साढ़े साती तब बोली ”

रामचरितमानस में मंथरा के लिए तुलसीदास जी लिखते हैं .उसके लिए ‘त्रिवक्रा ‘ शब्द का भी प्रयोग करते हैं तुलसी . अर्थात तीन टेढ़ापन मंथरा के अंदर है .और अगर शनि के ढाई ढाई बरस को तीन बार मिलाएं  तो तीनो मिलकर साढ़े साती हो जाती है .कैकेयी मंथरा के प्रभाव में आती है और मंथरा की प्रशंसा करती है .’ बकिहिं सराहइ मानि मराली ‘ . कैकेयी जैसी बुद्धिमती स्त्री भी दासी के प्रभाव में आ गयी .

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ” बुध ग्रह जिस ग्रह के प्रभाव में होता है वैसा फल देता है .”

यहाँ कैकेयी = बुध

मंथरा = शनि

पर कैसा शनि ?? साढ़े साती वाला

यहाँ यह संकेत देने की कोशिश की बुध ,शनि के साथ चंद्र हो या बुध ,शनि से एक घर आगे या पीछे चंद्र हो तो तो शनि की साढ़ेसाती में ऐसे बुध की दशा ज्यादा अशुभ प्रभाव देता है .

 

3 – अहल्या की कहानी सब को पता है .गौतम ऋषि का स्नान करने जाना ,इंद्र का आना और बुद्धि विवेक ( बुध) का अहल्या का साथ छोड़ जाना .देवराज इंद्र को ऋषि गौतम समझना और गौतम ऋषि के श्रापवश अहल्या का पत्थर हो जाना ,मूढ़ हो जाना .फिर भगवान राम के चरणस्पर्श से वापस अपने स्वरुप में आकर गतिशील होना .

ज्योतिषशास्त्र में एक योग है ” बुध और सूर्य के नजदीक होने से व्यक्ति में मूढ़ता आती है ”

सूर्य को अन्य कई रूपों के आलावा देव,राजा के रूप में भी जाना जाता है .इंद्र देव और राजा दोनों हैं .यहाँ अहल्या के पास इंद्र देव का काम ( शुक्र ) जाग्रत हुआ .अहल्या अविवेकी हुई .

इंद्र = सूर्य

काम = शुक्र

बुद्धि  = बुध

यहाँ हमें यह संकेत मिलता है की सूर्य और बुध अगर शुक्र के साथ हों या शुक्र की राशि में हों तो मूढ़ता आती है .

भगवान राम ( सूर्यवंशी )के चरण (मीन राशि ) स्पर्श से अहल्या की मूढ़ता का समाप्त होना ,मतलब यहाँ हमें यह संकेत मिलता है की सूर्य और बुध अगर मीन राशि में हों तो व्यक्ति विवेकी होगा ,गतिशील होगा .

 

4 – ” सृंगि रिषिहि वसिष्ठ बोलावा . पुत्रकाम शुभ जग्य करावा .

भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें .प्रगटे अगिनि चारु कर लीन्हें ”

महाराज दशरथ पुत्र प्राप्ति की मनोकामना लेकर गुरु वशिष्ठ के पास जब जाते हैं तो वशिष्ठ ऋषि खुद भी पुत्र कामेष्टि यज्ञ करा सकते थे परन्तु उन्होंने इसके किये श्रृंगी ऋषि को बुलाया .चाँद के दोनों सिरों को श्रृंग कहा जाता है .और श्रृंग वाला चाँद तब  होता है जब पूर्णिमा या अमावस्या नहीं हो .और चौथ तक का चाँद नहीं हो .

शृंगी = चंद्र

अगिनि = मंगल

अर्थात चंद्र और मंगल के सम्बन्ध की चर्चा है .हम कह सकते हैं की पूर्णिमा ,अमावस्या को छोडकर,चौथ के चाँद को छोड़कर यदि चंद्र और मंगल का सम्बन्ध बने तो स्त्री का ऐसा राज गर्भ धारण करने में सफल हो .

मैंने पहले भी कहा है कि  ज्योतिष सिर्फ ज्योतिषशास्त्र की किताबों में ही नहीं है बल्कि वेद ,पुरान ,उपनिषद ,ग्रन्थ ,संहिताओं में बिखरा पड़ा है .जरूरत है उन्हें खोजने की .अनुसन्धान करने का .समय की कसौटी पर कितना खरा उतरता है यह कसने का और तब जो मोती मिले उससे गुंथे हुए माला को देवी माँ की चरणों में अर्पित करने का .

” या देवी सर्वभूतेषु  बुद्धि रूपेण संस्थितः

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ”

क्रमशः …