Theory of Non Locality + Astrology

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सूक्ष्म तरंगो द्वारा संचार की राह बताता है ज्योतिष .

 कभी आपने गौर किया कि आपने अपने किसी ऐसे सगे संबंधी ,दोस्त को याद किया जो आपसे काफी दूर रह रहे हों और आपके याद करने के कुछ ही समय के भीतर उनका फ़ोन आ गया .ऐसा होते ही आपके मुख से बरबस ही निकलता है ‘ अद्भुत ‘. आपने अपने ही शहर में रहने वाले किसी परिचित को याद किया ,उनके बारे में सोचा और कुछ ही घंटो बाद आपके मुख्यद्वार पर घंटी बज उठती है .दरवाजा खोलते ही आप अपने सामने उसी परिचित को सामने खड़ा पाते हैं .तब भी आपके मुख से बरबस ही  निकलता है ‘ अद्भुत ‘

कभी आपने सोचा कि यह क्या है ?? यह कैसे हों गया ??

आइये इसके पीछे के रहस्य को आज जानें ..

प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन को कौन नहीं जानता .इन्होने जिस सिद्धांत को ( थ्योरी ऑफ़ नॉन -लोकैलिटी ) मानने से इंकार कर दिया और कहा कि दो पदार्थ जबतक एक दूसरे से प्रत्यक्ष संपर्क में न हों तब तक एक दूसरे पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते ,आज विज्ञान उनके ही बातों से असहमति दर्शा  रहा है .आज विज्ञान थ्योरी ऑफ़ सर्टेंटी से आगे जाकर थ्योरी ऑफ़ अनसर्टेनिटी की बात करता है . आज विज्ञान थ्योरी ऑफ़ नॉन लोकैलिटी कि बात करता है .

विज्ञान आज जिस बात को स्वीकार कर रहा है ,हमारे देश के महर्षियों ने हज़ारों साल पहले इसकी समुचित व्याख्या की है . उद्घोष किया है ..

कठोपनिषद –

” आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः

कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति  ”

परमेश्वर के सन्दर्भ में बात कही जा रही है ..

आसीनो = बैठा हुआ ही

दूरं व्रजति  = दूर पहुँच जाना

शयन = सोता हुआ भी

सर्वतः याति = सब ओर चलता रहता है

तो देखा आपने विज्ञान जिस बात को आज स्वीकार रहा है ,कठोपनिषद के द्वारा हमारे महर्षियों ने कितनी सरल भाषा में थ्योरी ऑफ़ नॉन लोकैलिटी को समझाया .इसे प्रतिपादित किया .एक ही समय में वे सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान से महान बताये गए हैं .परमेश्वर अपने निज परमधाम में निवास करते हुए भी भक्तों की पुकार सुनकर उनके पास दूर से दूर चले जाते हैं .शयन करते हुए भी ,सोते हुए भी भक्तों की पुकार सुनकर उनके पास दूर दूर तक चले जाते हैं .भगवान जहाँ विराजमान हैं ,वहीँ रहते हैं ,उनका स्थान परिवर्तन नहीं होता बल्कि वे सूक्ष्म रूप से तरंगों के द्वारा दूर बैठे अपने भक्तों तक पहुँच जाते हैं .इसी तरह वे शयनावस्था में भी अपने भक्तों के पास सुक्ष्म तरंगों द्वारा पहुँच जाते हैं .वे सर्वत्र सब रूपों में नित्य अपनी महिमा में स्थित हैं .उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं,दूर देश चलते भी वही हैं,सोते भी वही हैं और सब ओर आते जाते भी वही हैं .

इसका ही एक उदाहरण है दत्तात्रेय  . दत्तात्रेय कई बार ऐसा करते थे कि अपनी किसी बात को शिष्यों तक पहुँचाने के लिए उनसे संवाद नहीं करते थे बल्कि ध्यान कि अवस्था में जाकर उन बातों को अपने शिष्यों तक पहुंचा देते थे वगैर एक शब्द बोले .बिना कुछ कहे अपनी सोच को अपने शिष्यों तक पहुंचा देते थे .इसके लिए उनके शिष्यों को उनके सामने होना जरूरी नहीं था . ऐसे ही कई उदहारण है जहाँ गुरु अपनी बात अपने विद्यार्थियों तक ध्यान कि अवस्था में जाकर पहुंचा देते थे .

सूक्ष्म तरंगे जो दिखाई नहीं देती हैं पर अत्यंत तीव्र गति से अपने निर्धारित स्थान पर पहुंच जाती हैं . सन्देश पहुंचा देती हैं .

यह है भारतीय सनातनी दर्शन .इन सभी को दर्शन करने और इनकी गूढ़ता को समझने में ज्योतिषशास्त्र को महत्वपूर्ण योगदान है .यम, नियम , आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ,धारणा,ध्यान और समाधी के जरिये यह सर्वांग शुद्धि एवं शुचिता लाता है .तदोपरांत ही हम इन मन्त्रों कि गूढ़ता को समझ पाते हैं . मन की गांठों को खोलकर व्यक्ति को भीतर से जगाता है ज्योतिष .सकारात्मक ऊर्जा का संचार कैसे हो यह बताता है ज्योतिष . सूक्ष्म तरंगो द्वारा संचार करने की राह बताता है ज्योतिष . अपरा से परा को जोड़ता है ज्योतिष .

जरूरत है पीछे मुड़ने का ,पुनर्वापसी का, शास्त्रों को पढ़ने का,निज बोध का , अनुसन्धान का .निजमय होने का .

” या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः “