Decoding Ramcharit Manas ( Part 1)

 

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ज्योतिष के कुछ सूत्र मानस से

शारदीय नवरात्र .श्रद्धा ,भक्ति और विश्वास से देवी आराधना .श्रद्धा से ज्ञान और विश्वास से भक्ति की प्राप्ति होती है .श्रद्धा का कभी अंत नहीं होता .श्रद्धा का पालन किया जाता है . तुलसीदास ने इसी श्रद्धा और विश्वास से रामचरितमानस को प्रकाशित किया जिसमे उन्होंने न सिर्फ आध्यात्मिक उत्थान कैसे हो इसे दर्शाया , ज्योतिष को भिन्न भिन्न दृष्टांतो से समझाया बल्कि कई क्रन्तिकारी सूत्रों का भी सूत्रपात किया . इतने गूढ़ विषय को सर्वग्राह्य बनाया . लोकभाषा में रचकर इसे घर घर पहुँचाया .इनमे से कुछ सूत्रों और कुछ श्लोकों पर आज की चर्चा ..

1 – ” वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि
मंगलानां च कर्तारौ वन्दे वाणी विनायको ”
बालकाण्ड की शुरुआत ही तुलसीदास जी ने इस क्रन्तिकारी श्लोक से की है .सभी पूजन में पहले विनायक ,गणेश की पूजा पहले होती है पर यहाँ तुलसीदास जी ने कहा ” वन्दे वाणी विनायको ” अर्थात पहले सरस्वती की आराधना उसके बाद गणेश जी की वंदना . पहले स्त्री शक्ति की पूजा का उद्घोष किया तुलसी ने .
फिर कहा “मंगलानां ” ,मंगल की बात की . ‘ मगौ गति इति मंगल ‘ ,हमारा हर कदम आगे पड़े ,हम जड़ न हो जाएँ . मंगल की जब बात होती है तो उग्रता और हिंसा के रूप में ही प्रायः होती है लेकिन यहाँ मंगल को उन्नति और प्रगति का सूचक बताया है .

2 – ” वन्दे बोधमयं नित्यं गुरु शंकररुपिणं
यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ”
चन्द्रमा जब गुरु(बृहस्पति ) का सहारा लेता है तो लोग गुरु के साथ साथ चन्द्रमा की भी पूजा करने लगते हैं .यहाँ ” वक्रोपि चंद्र ” कहा है अर्थात वैसा चंद्र जिसमे श्रृंग हो ,अमावस या पूर्णिमा का न हो क्योंकि इन दोनों दिन वह श्रृंग से विहीन होता है . कहने का तात्पर्य यह की वैसा चंद्र जो बृहस्पति के साथ तो हो पर सूर्य से दृष्ट या सूर्य से युत न हो तो ऐसा चंद्र पूजनीय हो जाता है ,शुभ फल प्रदायी होता है .
( चंद्र + बृहस्पति (जब सूर्य से दृष्ट या युत न हो ) = शुभ फल
गजकेसरी योग को समझने के लिए महत्वपूर्ण सूत्र पकड़ाता है यह हमें .

3 -“बाल्मीकि नारद घटजोनी
निज निज मुखनि कहौ निज होनी ”
घट माने कुम्भ .कुम्भ राशि की चर्चा बाल्मीकि और नारद जी के दृष्टान्त से . बाल्मीकि जी जन्म से ब्राह्मण थे .संग से भील हो गए .एक दिन सप्तऋषि से मिल गए तो उनके साथ से ब्रह्म सामान हो गए .उसीप्रकार नारद जी पहले दासीपुत्र थे ,चार महीने के लिए संतों का साथ मिला और भगवान के पार्षद हो गए .दोनों का संतो ( बृहस्पति ) का साथ मिला .बाल्मीकि ब्राह्मण ( बृहस्पति )वर्ण के थे .नारद दासी ( शनि ) पुत्र थे .
बाल्मीकि ब्रह्म सामान हो गए और नारद देवताओं के पार्षद नियुक्त हुए .
घटजोनी अर्थात कुम्भ तो यहाँ हम यह कह सकते हैं की कुम्भ राशि में शनि का होना उतना लाभकारी नहीं ( भले हि वह स्वराशि में है )जितना की कुम्भ राशि में बृहस्पति का होना . बृहस्पति का कुम्भ राशि में होना ज्यादा लाभकारी .

4 -“हरिहर जस राकेश राहु से . पर अकाज भट सहसबाहु से .
जे परदोष लखहिं सहसाखी .पर हित घृत जिन्ह के मन माखी ”
राकेश = चंद्र
राहु
चंद्र + राहु दूसरों की प्रसंशा को भी निंदा में बदल दे .जो दूसरों का दोष देखने के लिए हज़ार आंखवाले हो जाते हैं और दूसरे की भलाई काम होता है तो जैसे घी रखा हो और मक्खी गिर जाती है न ऐसे हि उनका मन मक्खी की तरह गिरकर दूसरे का घी बिगड़ देता है .भलाई का काम बिगाड़ देते हैं .

5 – ” धूम कुसंगति कारिख होइ .
लिखिअ पुरान मंजू मसि सोइ ”
धूम के शुभ और अशुभ दोनों फलों की चर्चा .धूम ,धुआं जब दीवार पर लगता है तब कालिख बनता है लेकिन जब इसी कालिख से स्याही बना लेते हैं तो उसी कालिख से बने स्याही से वेद पुरान लिखे जाते हैं .कह सकते हैं की धूम सिर्फ अशुभ फल ही नहीं देगा बल्कि ग्रहो के साथ और दशा के अनुरूप फल देगा .
ज्योतिष सिर्फ ज्योतिषशास्त्र की किताबों में ही नहीं है बल्कि वेद ,पुरान ,उपनिषद ,ग्रन्थ ,संहिताओं में बिखरा पड़ा है .जरूरत है उन्हें खोजने की .अनुसन्धान करने का .समय की कसौटी पर कितना खरा उतरता है यह कसने का और तब जो मोती मिले उससे गुंथे हुए माला को देवी माँ की चरणों में अर्पित करने का .
” या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थितः
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ”
क्रमशः …