PITRIPAKSH / SHRADH

 

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श्राद्ध ( पुराण,ज्योतिषऔरविज्ञानकिनज़रसे )

जानिए 13  सितंबर से शुरू होने वाले पितृपक्ष ( श्राद्ध ) को  भिन्न भिन्न आयामों द्वारा –

मार्कण्डेय पुराण में ऋतुध्वज अपनी पत्नी मदालसा को कहते हैं कि पुत्रों को प्रवृत्ति मार्ग में लगाओ .ऐसा करने से कर्म मार्ग का उच्छेद नहीं होगा तथा पितरों के पिंडदान का लोप नहीं होगा .जो पितर देवलोक में हैं , तिर्यक योनि में जो परे हैं ,वे पुण्यात्मा हो या पापात्मा ,जब भूख ,प्यास से विकल होते हैं तो अपने कर्मो में लगा हुआ मनुष्य पिंडदान द्वारा उन्हें तृप्त करता है .तब मदालसा अपने पुत्र अलर्क को श्राद्ध कर्म के बारे में बतलाते हुए कहती हैं कि मृत्यु के पश्चात् जो श्राद्ध किया जाता है उसे औरघवदैहिक श्राद्ध कहते हैं .व्यक्ति जिस दिन ( तिथि में ) मरा  हो ,उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध करना चाहिए .उसमे विश्वदेवों कि पूजा नहीं होती. एक ही पवित्रक का उपयोग किया जाता है .आवाहन तथा अग्निकरण कि क्रिया भी नहीं होती .ब्राह्मण के उच्छिष्ट के समीप प्रेत को तिल और जल के साथ अपसव्य होकर ( जनेऊ को दाहिने कंधे पर डालकर )उसके नाम गोत्र का स्मरण करते हुए एक पिंड देना चाहिए .तत्पश्चात हाथ में जल लेकर कहें  – ‘ अमुक के श्राद्ध में दिया हुआ अन्न-पान आदि अक्षय हो यह कहकर वह जल पिंड पर छोड़ दे ,फिर ब्राह्मणो का विसर्जन करते समय कहे ‘ अभिरंबताम’ ( आपलोग सब तरह से प्रसन्न हों ). उस समय ब्राह्मण लोग कहें  ‘अभिरता स्मः ‘( हम भली भांति संतुष्ट हैं ).श्राद्ध में विषम संख्या में ब्राह्मणो को आमंत्रित करे .पिता ,पितामह और प्रपितामह इन तीनो पुरुषों को पिंड के अधिकारी समझना चाहिए .यही बात मातामहों के श्राद्ध में भी होना चाहिए . पितृश्राद्ध में बैठे हुए सभी ब्राह्मणो को आसन के लिए दोहरे मुरे हुए कुश देकर उनकी आज्ञा ले विद्वान पुरुष  मन्त्रोच्चारपूर्वक पितरों का आवाहन करे और अपसव्य होकर पितरों कि प्रसन्नता के लिए तत्तपर हो उन्हें अर्घ्य निवेदन करे .इसमें जो के स्थान पर तिल का प्रयोग करना चाहिए .नमक से रहित अन्न लेकर विधिपूर्वक अग्नि में आहुति दे . ‘अग्नये कव्यवाहनाये स्वाहा ‘ इस मन्त्र से पहली आहुति दे , ‘ सोमाय पितृमते स्वाहा ‘ इस मंत्र से दूसरी आहुति दे तथा ‘यमाये प्रेत्पतये स्वाहा ‘इस मंत्र से तीसरी आहुति दे .आहुति से बचे हुए अन्न को ब्राह्मणो के पात्र में परोसें फिर विधिपूर्वक जो जो अन्न उन्हें अत्यंत प्रिय लगे वह वह उनके सामने खुशीपूर्वक प्रस्तुत करे .ब्राह्मणो को आग्रहपूर्वक भोजन कराये .उनके भोजनकाल में रक्षा के लिए पृथ्वी पर तिल और सरसो बिखेर दे और रक्षोग्न मन्त्र का पाठ करे क्योंकि श्राद्ध में अनेक प्रकार के विघ्न उपस्थित होते हैं .अंत में यथा शक्ति दान देकर ब्राह्मणो से कहें ‘ सुस्वधा अस्तु ‘( यह श्राद्धकर्म भली भांति संपन्न हो ) ब्राह्मण भी संतुष्ट होकर कहें ‘ तथास्तु ‘इसके बाद उनका आशीर्वाद ले और उन्हें विदा करे ,तत्पश्चात अथितियों को भोजन कराएं .इसके बाद बचा हुआ भोजन यजमान ग्रहण करे.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य के कन्या राशि में जब गोचर हो रहा होता है तब श्राद्धकर्म किया जाता है .इसे पितृपक्ष कहते हैं .हमारा सारे व्रत और त्योहार सूर्य और चन्द्रमा के परस्पर संबंधों पर आधारित हैं पर यह सिर्फ सूर्य पर आधारित है .जब सूर्य का गोचर कन्या राशि में हो रहा हो ,भादो महीने में . ज्योतिष्शास्त्र ने हज़ारों वर्ष पूर्व सूर्य के कन्या राशि में गोचर के साथ पितरों कि चर्चा कि यह विज्ञानं सम्मत भी है . कैसे ,आइये जाने -पृथ्वी और अन्य ग्रह सूर्य के चारो तरफ चक्कर लगाते हैं .सूर्य आकाशगंगा के चारो तरफ घूमता है और कई आकाशगंगाओं का समूह जिस तारामंडल के चारो तरफ घूमते हैं उस तारामंडल कि गति दिशा कन्या राशि कि तरफ होती है ,इसे विज्ञान virgo super cluster कहता है .

है न आश्चर्य कि बात कि आज विज्ञान जिस बात को स्वीकार रहा है ,ज्योतिषशास्त्र हज़ारो वर्ष पूर्व ही उसका दर्शन करा  चुका है .उन्होंने इस मार्ग को पितृमार्ग कहा .इसके विपरीत राशि मीन राशि वाले मार्ग को देवमार्ग कहा .इसका सारगर्भित अर्थ यह कि पितृमार्ग अर्थात जनम -मरण-जनम -का चक्र .