रामचरितमानस से ज्योतिषशास्त्र को समझने का एक प्रयास ..

” ग्रसइ न कैकेयी करतब राहु”
यहाँ तुलसीदास जी चाहते तो लिख सकते थे ,
“डसइ न कैकेयी करतब राहु”
( राहु को सर्प माना जाता है और सर्प डसता है )

पर उन्होंने ऐसा नहीं लिखा।डसइ की जगह ग्रसइ लिखा।
यहाँ एक शब्द ‘ ग्रसइ ‘, राहु को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल देता है।
ग्रसइ = ग्रास = कौर =सीधा सीधा निगल जाना या फिर churning/ mixing के बाद निगलना

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