SHAKUN

भारतीय आचार्यों ने शकुन को तीन खण्डों में रखा है –

1- क्षेत्रिक शकुन – वैसा शकुन जिसे पूर्व योजना के तहत देखा जाए।

2- आगन्तुक शकुन – वैसा शकुन जो यात्रा के समय अपने आप सामने
 उपस्थित हो जाए।

3- जांग्घिक शकुन – वैसा शकुन जो यात्रा के समय अपने आप वाम भाग 
या दक्षिण भाग में ग्राम के अंत में या नगर के अंत में अकस्मात 
उपस्थित हो जाए।
तुलसीदास जी ने तीनों प्रकार के शकुनों की चर्चा एकसाथ,भगवान राम 
की ‘बारात यात्रा ‘के समय की है।
बनइ न बरनत बनी बराता । होहिं सगुन सुंदर सुभदाता ।।
चारा चाषु बाम दिसि लेई । मनहुँ सकल मंगल कहि देई ।।
दिहिन कान सुखेत सुहावा । नकुल दरसु सब कहुँ पावा ।।
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । सघट सबाल आब बर नारी ।।
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा । सुरभि सनमुख सिसुहि पिआवा ।।
मृगमाला फिरि दाहिन आई ।मंगल गन जनु दीन्ह देखाई ।।
छेमकरी कह छेम बिसेषी । स्यामा बाम सुतरू पर देखी ।।
सनमुख आयो दधी और मीना। कर पुस्तक दुइ विप्र प्रबीना ।
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार ।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार ।।

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